Tribal Revolts in Bihar : बिहार में आजादी से पहले अंग्रेजो के विरुद्ध बहुत सारे जनजातीय विद्रोह हुए थे | इसमें संथाल विद्रोह , चेरो विद्रोह इत्यादि प्रमुख विद्रोह हैं | बिहार में जनजातीय एवं किसानों की दयनीय हालात के कारण अंग्रेजों से कई युद्ध एवं विद्रोह हुए जिसमें कई मित्रों सफल भी हुए | इसका अध्ययन यानि प्रेक्टिस कर लेना चाहिए, जिससे एक्साम के वक्त हमे कोई डॉउट ना रहे |बिहार भारत के पूर्वी भाग में पूरी तरह से भूमि से घिरा राज्य है। बिहार के उत्तर में नेपाल और दक्षिण में झारखंड से घिरा है।
बिहार अंग्रेज के समय महत्वपूर्ण युद्ध का गढ़ रहा है यहाँ से कई वीरो ने अंग्रेजो के पसीने छुरा दिए है आज हम इस पोस्ट के माध्यम से उन वीरो के द्वारा की गयी जन आंदोलन जानेंगे | इस पोस्ट के माध्यम से बिहार में हुए सभी प्रमुख विद्रोह के बारे में जान पाएंगे और यह विद्रोह कब कब हुए या अभी इस पोस्ट में हम देखेंगे | अगर आपको यह पोस्ट अच्छा लगता है तो आप इसे अपने दोस्तों में शेयर जरूर करें |

संथाल विद्रोह (Santhal Revolt )
संथाल विद्रोह 1855-56 में हुए थे |संथाल विद्रोह जिसे क्षेत्रीय तौर पर “संथाल- हूल” के नाम से जानते है | झारखंड के जनजातीय आंदोलनों में संभवत: सबसे व्यापक एवं प्रभावशाली विद्रोह था । वीरभूम, ढालभूम, सिंहभूम, मानभूम और बाकुड़ा के जमींदारों द्वारा सताए गए संथाल 1790 ई. से ही संथाल परगना क्षेत्र, जिसे दामिन-ए-कोह कहा जाता था में आकर बसने लगे। संथाल विद्रोह ने कंपनी और उसके समर्थित जमींदारों, सेवकों और अधिकारियों को बहुत बड़ी संख्या में जनहानि पहुँचाई थी।
‘हो’ विद्रोह (‘Ho’ Revolt)
यह विद्रोह सन् 1821-22 छोटानागपुर के ‘हो’ लोगों ने सिंहभूम के राजा जगन्नाथ सिंह के विरुद्ध किया।यह विद्रोह अंग्रेजों के साथ-साथ छोटानागपुर खास के नागवंशी शासकों तथा जमींदारों के खिलाफ भी था।हो जनजाति लड़ाकू स्वभाव के थे, वे स्वतंत्रता प्रेमी थे, इसलिए सिंहवंशियो की अधीनता कभी स्वीकार नही की। उधर सिंहवंशी राजा जगन्नाथ सिंह इस क्षेत्र को अपने नियंत्रण में रखना चाहता था।
खरवार आंदोलन (Kharvar Movement)
झारखण्ड में हुए जनजातीय सुधारवादी आंदोलनों में खरवार/खेरवाड़ आंदोलन का उल्लेखनीय स्थान है।जिसका नेतृत्व भागीरथ माँझी ने किया था, का उद्देश्य प्राचीन मूल्यों और जनजातीय परंपराओं को पुनः स्थापित करना था। इस आंदोलन का प्रभाव क्षेत्र संथाल परगना था।
सरदारी आंदोलन (Sardari Movement)(1858-95)
यह आदिवासियों द्वारा ईसाई धर्म अपना लेने से भूमि की समस्या और बदतर हो जाने के कारण हुई। ईसाई धर्म के व्यापक प्रचार-प्रसार के विरुद्ध जनजातीय सुधारवादी आंदोलन चले। सरदारी आंदोलन सन् 1859 से 1881 के मध्य चला।
इस आदोलन का उल्लेख एस.सी. राय ने अपनी पुस्तक ‘द मुंडाज (The Mundaj)’ में किया है।इस आदोलन का मूल उद्देश्य जमींदारों को बाहर निकालना, बेगारी प्रथा को समाप्त करना और भूमि पर लगाए गए प्रतिबंधों का विरोध करना था।
कोल विद्रोह (Kol Revolt)
इस विद्रोह में प्रमुख छोटानागपुर, पलामू, सिंहभूम और मानभूम की कई जनजातियों का संयुक्त विद्रोह था, जो अंग्रेजों के बढ़ते हस्तक्षेपों के शोषण के खिलाफ उपजा था।1831 ईसवी में किया गया एक विद्रोह है, जो 1833 तक चला।
कोल विद्रोह’ झारखंड के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है, क्योंकि इसके अनेक दूरगामी परिणाम हुए। इसी विद्रोह ने प्रशासनिक व्यवस्था के सुधार की नींव रखी।
तमाड़ विद्रोह (Tamad Revolt )
1771 में जब अंग्रेजों ने छोटानागपुर पर अपना अधिकार जमा लिया था और यहाँ के राजाओं एवं जमींदारों को कंपनी का संरक्षण मिल चुका था और प्रजा के शोषण की छूट मिल गई थी। जमींदारों द्वारा किसानों की जमीनें हड़पनी शुरू कर दी तब इस शोषण नीति ने उराँव जनजाति के लोगों में विद्रोह की आग भड़का दी। इस जनजाति ने तेवर दिखाने शुरू कर दिए और जमींदारों पर टूट पड़ी। सन् 1794 तक इन विद्रोहियों ने जमींदारों को इतना भयभीत कर दिया कि उन्होंने अंग्रेज सरकार से अपनी रक्षा करने की गुहार लगाई।अंग्रेजों ने परिस्थिति को भाँपा और पूरी शक्ति से विद्रोह को कुचल दिया।
चेरो विद्रोह (Chero Revolt)
यह विद्रोह सन् 1800 में चेरो किसानों ने अपने राजा के विरुद्ध शुरू किया। यह विद्रोह अंग्रेजों की नीति के विरोध में हुआ जब जयनाथ सिंह को हटा कर गोपाल राय को राजा बना दिया। कुछ समय बाद गोपाल राय कुछ विद्रोही चेरो सरदारों के साथ मिल गया, जिससे अंग्रेज रुष्ट हो गए और गोपाल राय को बंदी बनाकर पटना जेल में डाल दिया।
इसके बाद अंग्रेजों ने चूड़ामन को वहाँ का राजा बना दिया और चूड़ामन ने अंग्रेजों की सहायता से जनजातीय हित प्रभावित होते थे। इससे लोगों में असंतोष में खुला विद्रोह शुरू हो गया। कर्नल जोंस ने इस विद्रोह को कुचलने के प्रयास किए परन्तु दो वर्षों तक चेरो विद्रोही अंग्रेजों और चूड़ामन राय को छकाते रहे। अंततः भूषण सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। सन् 1802 में इस विद्रोही चेरो नेता को फाँसी दे दी गई और इसके बाद यह विद्रोह भी धीरे-धीरे समाप्त हो गया।
टाना भगत आंदोलन (Tana Bhagat Movement)
यह आंदोलन सन् 1914 में शुरू बिरसा आंदोलन से उत्पन्न हुआ बहुआयामी आंदोलन था इसके नायक भी अपनी सामाजिक अस्मिता, धार्मिक परंपरा और मानवीय अधिकारों के मुद्दों को लेकर आगे आए थे। टाना भगत कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि उराँव जनजाति की एक शाखा थी, जिसने कुडुख धर्म अपनाया था। इन लोगों की स्थिति अत्यंत दयनीय और अधिकांशतः श्रमवाले कार्य ही कराए जाते थे।
इस आंदोलन के नायक ‘जतरा भगत’ नामक नौजवान था जो अलौकिक सिद्धियों में रत रहता था। जतरा भगत ने ‘धर्मेश’ देवता का आदेश पर उपदेश दिए जिससे उराँव जनजाति में वह बहुत लोकप्रिय हो गया और लोग उसकी प्रत्येक बात को आत्मसात् करने लगे। इससे अंग्रेज घबरा गए और उन्होंने जतरा भगत को गिरफ्तार कर लिया। इससे उराँव लोगों में रोष फैल गया। परिणाम में हिंसा भड़क उठी और एक सामाजिक जनजागरण व्याप्त हो गया। अंग्रेजों ने बड़ी क्रूरता से इस आंदोलन को दबा दिया, फिर भी यह आंदोलन सामाजिक चेतना जगाने में सफल रहा।
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भूमिज विद्रोह (Bhumij or Land Revolt)
भूमिज विद्रोह जनजातीय जमींदारों और जनजातीय लोगों का संयुक्त विद्रोह था अगुआई बड़ाभूम के राजा बेलाक नारायण के पोते गंगानारायण ने की थी।
विद्रोह के कारण आदिवासी उत्पीड़न से उपजा था। बड़ाभूम की जागीर को गंगानारायण और भाई माधव सिंह ने हड़पने का षड्यंत्र रचा था। माधव सिंह दीवान था और उसने जनता का बहुत शोषण किया था। जब गंगानारायण ने उसका विरोध किया तो वह कंपनी सेना की शरण में जा पहुँचा। गंगानारायण के नेतृत्व में एक संयुक्त विद्रोह की भूमिका बनी, जिसमें जनजातीय लोगों की भूमिका रही। सन् 1832 में ही जब कोल विद्रोह को दबाने के प्रयास चल रहे थे, उसी दौरान गंगानारायण ने अपने विद्रोही गुट के साथ विद्रोह का बिगुल बजा दिया। इस विद्रोह को अंग्रेजों ने ‘भूमिज विद्रोह’ की संज्ञा दी। शीघ्र ही विद्रोह ने व्यापक रूप ले लिया और कंपनी सेना इन विद्रोहियों को दबाने के लिए लेफ्टिनेंट बैंडन और टिमर के नेतृत्व में निकल पड़ी। खरसावाँ का ठाकुर अंग्रेजों की ओर से लड़ा।
‘भूमिज विद्रोह’ भी प्रशासनिक व्यवस्था के सुधार का एक कारण बना। अंग्रेज मान गए थे आदिवासी लोगों को न्याय-व्यवस्था की पारदर्शिता न मिलना और उनका किसी भी प्रकार का उत्पीड़न नए विद्रोह को जन्म देने वाले थे।
बिरसा मुंडा आंदोलन (Birsa Munda Movement)
वर्ष 1899-1900 में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुआ मुंडा विद्रोह छोटा नागपुर (झारखंड) के क्षेत्र में सर्वाधिक चर्चित विद्रोह था। इसे ‘मुंडाउलगुलान’ (विद्रोह) भी कहा जाता है। इस विद्रोह की शुरुआत मुंडा जनजाति की पारंपरिक व्यवस्था खूंटकटी की ज़मींदारी व्यवस्था में परिवर्तन के कारण हुई और महिलाओं की भूमिका भी उल्लेखनीय रही।
अंग्रेज़ों को करों और साहूकारों को ऋण/ब्याज का भुगतान न करने के लिये जनता को संगठित किया। इस प्रकार उन्होंने ब्रिटिश शासन के अंत और झारखंड में मुंडा शासन (तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी क्षेत्र) की स्थापना के लिये विद्रोह का नेतृत्त्व किया।
फरवरी 1900 में बिरसा मुंडा को सिंहभूम में गिरफ्तार कर राँची ज़ेल में डाल दिया गया जहाँ जून 1900 में उनकी मृत्यु हो गई। आदिवासियों के खिलाफ शोषण एवं भेदभाव के विरुद्ध उनके संघर्ष के कारण ही वर्ष 1908 में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम पारित किया गया, जिसने आदिवासी लोगों से गैर-आदिवासियों में भूमि के हस्तांतरण को प्रतिबंधित कर दिया।