CDP Questions से सम्बंधित प्रश्नों को भारत की लगभग सभी सरकारी शिक्षकों की परीक्षाओं में पूछा जाता है| बाल विकास शिक्षा शास्त्र के प्रश्न केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के द्वारा शिक्षक पात्रता परीक्षा सीटेट आयोजित की जाती है | बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र के कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों को देखेंगे जो केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा आयोजित पात्रता परीक्षा में के लिए अति महत्वपूर्ण है। किसी भी शिक्षक भर्ती परीक्षा में सफलता की कुंजी CDP ही होती है। इस विषय में अच्छे अंक प्राप्त किए बिना परीक्षा पास करना लगभग असंभव है।
Important Child Development & Pedagogy आपके CTET परीक्षा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है | Important CDP question answer आपके शिक्षक पात्रता परीक्षा जैसे की – CTET, UPTET, HPTET, PSTET,BPSC TET ,MPTET ,etc में इससे सम्बंधित प्रश्न पूछे जाते हैं | परीक्षा के अंतिम दिनों में जब समय कम होता है, तब विस्तृत थ्योरी (Theory) पढ़ने के बजाय बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र वन लाइनर प्रश्नों (CDP One Liner Questions in Hindi) का अभ्यास करना सबसे प्रभावी रणनीति मानी जाती है जिसे आप इस आर्टिकल “Practice Child Development & Pedagogy One Liner” के द्वारा अभ्यास किया जा सकता है|

बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र के परीक्षा सम्बंधित प्रश्नों का अभ्यास करें | CDP Notes | Practice Child Development & Pedagogy One Liner
- विकास का सिद्धांत नहीं है—विकास एकधारणीय और एका-आयामी होता है।
- विकास के सिद्धांत है कि विकास ऊपर से नीचे की ओर तथा केन्द्र से बाहर की ओर होता है।
- विकास आनुवंशिकता और सम्पोषण से प्रभावित होता है।
- विकास सामाजिक-सांस्कृतिक परिपेक्ष में होता है।
- बाल विकास का सिद्धान्त है-
- (i) निरंतर विकास का सिद्धान्त
- (ii) विकास दिशा का सिद्धान्त
- (iii) वैयक्तिव विभिन्नता का सिद्धान्त
- (iv) क्रमबद्धता का सिद्धान्त
- (v) वंशानुगत व वातावरण की अंतर्क्रिया का सिद्धान्त ।
- (A) शीर्षगामी सिद्धान्त विकास के ‘गामक विकास’ के क्षेत्र पर लागू होता है।
- विकास से तात्पर्य अंगों के बेहतर और संवर्धित कार्य के लिए संरचना में वृद्धि से है।
- एक बच्चा एक क्रमबद्ध क्रम में विकसित होता है जो लगभग सभी बच्चों में समान होता है।
- विकास का शीर्षगामी सिद्धान्त में बालकों का विकास सिर से पैर तक होता है।
- विकास के कुछ क्षेत्र हैं जैसे भौतिक (गामक), संज्ञानात्मक, सामाजिक-भावनात्मक, नैतिक और भाषाई क्षेत्र आदि।
- बालक के शारीरिक विकास में मस्तिष्क और शरीर में वृद्धि और परिवर्तन शामिल है, जिनमें इंद्रिय अंग, गत्यात्मक कौशल, स्वास्थ्य आदि शामिल होता है।
- बालक के शारीरिक विकास जो शरीर के केंद्र से बाहर की ओर होता है, उसे समीपोदूरस्थ विकास कहते हैं।
- बाल विकास दो दिशाओं में होता है, एक सिर से पैर की दिशा (शीर्षगामी) से होता है और दूसरा निकट से दूर (समीपोदूरस्थ) की ओर होता है। दोनों सिद्धांत गामक विकास के क्षेत्र में लागू होते हैं:
- बालक का विकास सिर से पैर की दिशा में होता है, शुरूआत में सबसे पहले बालक सिर को उठाता है, फिर बैठना सीखता है, तश्पश्चात चलना सीखता है। इसे ही विकास की शीर्षगामी सिद्धान्त कहते हैं, जो गामक विकास के क्षेत्र पर लागू होता है।
- भाषा विकास के संदर्भ में ‘प्रारंभिक अवस्था’ बहुत ही संवेदनशील अवस्था होती है।
- सामाजिक विकास जीवन भर सामाजिक कौशल और मूल्यों के विकास को संदर्भित करता है।
- भावनात्मक विकास किसी की अपनी भावनाओं और साथ ही दूसरों को नियंत्रित करने और प्रबंधित करने की क्षमता के विकास को संदर्भित करता है।
- संज्ञानात्मक विकास यह किसी समस्या को तर्क करने, सोचने, समझने और हल करने की क्षमता के विकास को संदर्भित करता है।
- भाषा विकास यह भाषा को समझने, जानने और उपयोग करने की क्षमता के विकास को संदर्भित करता है।
- नैतिक विकास यह सही और गलत के बीच अंतर सीखने की क्षमता के विकास को दर्शाता है।
- बाल्यावस्था मानव जीवन काल की जन्म से लेकर युवावस्था तक की अवधि को दर्शाता है। इसमें कई विकासात्मक अवस्थाएं होती हैं और प्रारंभिक बाल्यावस्था उनमें से एक है।
- प्रारंभिक बाल्यावस्था भाषा विकास में अति महत्त्वपूर्ण अवस्था माना जाता है।
- प्रारंभिक बाल्यावस्था में आयु के साथ-साथ बालकों के सीखने की गति में वृद्धि होती है। प्रत्येक क्रिया के साथ भाषा विस्तार होती है।
- प्रारंभिक बाल्यावस्था में बालक शब्द से लेकर वाक्य विन्यास तक की सभी क्रियाए सीख लेता है।
- प्रारंभिक बाल्यावस्था में बालकों को वस्तुओं को देखकर उसका प्रत्यय ज्ञान हो जाता है तथा अपने आस-पड़ोस तथा घर समुदाय में बच्चे सुनकर भाषा सीख लेता है।
- प्रारंभिक बाल्यावस्था में भाषा के विकास की अवस्था के 3-12 महीने अवधि में एक बच्चा सबसे अधिक कूजन और हंसता है, आवाज़ से खेलता है, और लहराते हुए इशारों के साथ संवाद करना शुरू करता है। बड़बड़ाना पहले वर्ष के दौरान एक महत्वपूर्ण विकासात्मक अवस्था है।
- प्रारंभिक बाल्यावस्था में भाषा के विकास की अवस्था के 12-18 महीने के उम्र में, बच्चे अक्सर अपने पहले शब्दों को अर्थ के साथ कहते हैं। उदाहरण के लिए, जब आपका बच्चा ‘दादा’ कहता है, तो एक बच्चा वास्तव में पिताजी को बुला रहा होता है।
- प्रारंभिक बाल्यावस्था में भाषा के विकास की अवस्था के 18 महीने से 2 साल के उम्र में बच्चे में उनकी शब्दावली बढ़ती है और वे दो शब्दों को एक साथ संक्षिप्त ‘वाक्य’ में रखना शुरू करेंगे।
- प्रारंभिक बाल्यावस्था में भाषा के विकास की अवस्था के 2-3 साल के उम्र में एक बच्चा अब और अधिक जटिल वाक्यों में बोल सकता है, और शब्दों को सही ढंग से कहने में बेहतर हो रहा है। एक बच्चा उसी समय खेल और बात कर सकता है।
- प्रारंभिक बाल्यावस्था में भाषा के विकास की अवस्था के 3-5 साल के उम्र में एक बच्चा शायद ऐसी बातें कहे, ‘क्या मैं तरबूज उगाउंगा क्योंकि मैंने तरबूज के बीज को निगल लिया था?’ और बुनियादी व्याकरण की समझ दिखानी चाहियें, क्योंकि वे अधिक जटिल वाक्यों के साथ प्रयोग करते हैं जिनमें ‘क्योंकि’, ‘अगर’, ‘तो’ या ‘जब’ जैसे शब्द होते हैं।
- प्रारंभिक बाल्यावस्था में भाषा के विकास की अवस्था के 5-8 साल के उम्र में एक बच्चा विभिन्न तरीकों से कहानीकार बन सकता है और विभिन्न प्रकार के वाक्य बना सकता है। ये कौशल बच्चे को विचारों और रायों को साझा करने की भी अनुमति देते हैं।
- इसलिए प्रारंभिक बाल्यावस्था भाषा के विकास की एक संवेदनशील अवधि है।
- परिवार में आरंभ होने वाली वह प्रक्रिया जिसमें बच्चे अपनी व्यक्तिगत पहचान जानना शुरू करते हैं, भाषा सीखते हैं और आरंभिक संज्ञानात्मक कौशल विकसित करते हैं, प्रारंभिक समाजीकरण कहते है।
- बच्चा जब इस संसार में आता है तब वह कोरे कागज की तरह होता है, फिर धीरे-धीरे जैसे वह बड़ा होने लगता है अपने आस-पास के साधनों द्वारा प्रभावित होने लगता है। तथा निरंतर वह आदर्शो व मूल्यों को सीखता है। इन आदर्शो व मूल्यों को वह अपने समाज (परिवार, साथी, स्कूल, शिक्षक) से सीखता है यह प्रारंभिक समाजीकरण का उदाहरण है |
- समाजीकरण के कुछ सक्रिय कारक है जैसे—परिवार, आस- पड़ोस, स्कूल, मित्रगण आदि।
- समाजीकरण के कुछ निष्क्रिय कारक हैं जैसे—पुस्तकालय, खेल का मैदान, आदि।
- अमेरिकी मनोवैज्ञानिक लॉरेंस कोहलबर्ग ने ‘नैतिक विकास के सिद्धांत‘ का प्रस्ताव दिया। उन्होंने अपने सिद्धांत में नैतिक विकास का एक व्यवस्थित अध्ययन प्रस्तुत किया है जिसमे 3 स्तरों और 6 अवस्थाओं में वर्गीकृत किया गया है।
- लॉरेंस कोहलबर्ग के सिद्धान्त में ‘पारंपरिक चरण’ में नैतिक चिंतन शुरूआती सामाजिक परिपेक्ष पर आधारित होता है।
- परम्परागत नैतिकता, नैतिकता का एक चरण है जिसमें:
- बच्चे दूसरों को खुश करने के लिए निर्णय लेते हैं।
- बच्चे पारस्परिक संबंधों को बनाए रखने की कोशिश करते हैं।
- बच्चे दूसरों के अनुमोदन पर प्रयास करते हैं।
- लॉरेंस कोहलबर्ग ने ‘नैतिक विकास के सिद्धांत‘ से नैतिक विकास तीन स्तरों में होता है और प्रत्येक स्तर के दो चरण होते हैं
- पूर्व-पारंपरिक स्तर-यह 9 वर्ष से कम उम्र के छोटे बच्चों के लिए चरण है । पूर्व-पारंपरिक स्तर पर, बच्चे अपने आसपास के लोगों से सही और गलत सीखते हैं।एक बच्चे का व्यवहार आज्ञाकारिता और दंड की ओर उन्मुख होता है।
- चरण -1 सजा-आज्ञाकारिता अभिविन्यास
- चरण -2 स्वार्थ अभिविन्यास
- पारंपरिक स्तर- बड़े बच्चे, किशोर और अधिकांश वयस्क के स्तर पर, बच्चे यह मानते हैं कि नियमों को बदला जा सकता है यदि वे समाज की सामान्य भलाई में सहायक नहीं हैं।
- चरण -3 अच्छा लड़का-अच्छी लड़की अभिविन्यास
- चरण -4 प्राधिकरण और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने संबंधी अभिविन्यास
- उत्तर-पारंपरिक स्तर- वयस्कों में, सही और गलत की भावना स्वयं के विवेक द्वारा तय की जाती है और बाहर से कुछ भी नहीं लगाया जा सकता है।
- चरण -5 सामाजिक-अनुबंध की स्थिति
- चरण -6 सार्वभौमिक-नैतिक-सिद्धांत अभिविन्यास
- पूर्व-पारंपरिक स्तर-यह 9 वर्ष से कम उम्र के छोटे बच्चों के लिए चरण है । पूर्व-पारंपरिक स्तर पर, बच्चे अपने आसपास के लोगों से सही और गलत सीखते हैं।एक बच्चे का व्यवहार आज्ञाकारिता और दंड की ओर उन्मुख होता है।
- पियाजे के सैद्धान्तिक दृष्टिकोण से नई सूचनाओं को अपने मौजूदा ज्ञान में शामिल करना आत्मसात्करण कहते हैं।
- जीन पियाजे के अनुसार बालक आत्मसात्करण और सामंजस्य की प्रक्रियाओं के बीच संतुलन कायम करता है। जब बच्चे के सामने कोई नई समस्या होती है, तो उसमें संज्ञानात्मक असंतुलन उत्पन्न होता है। उस असंतुलन को दूर करने के लिए वह आत्मसात्करण या समंजन या दोनों प्रक्रियाओं को प्रारंभ करता है।
- जीन पियाजे ने अपने संज्ञानात्मक विकास के सिद्धान्त में दो पदों का उपयोग किया—संगठन और अनुकूलन।
- अनुकूलन की सम्पूर्ण प्रक्रिया को दो उप प्रक्रियाओं में बांटा गया — आत्मसात्करण (Assimilation) समंजन (Accomoda- tion)
- मीना अब शब्दों का प्रयोग करने लगी है तथा यह समझने लगी है कि शब्द वस्तुओं के प्रतीक हैं। अब तर्क करने लगी है परन्तु प्रत्ययों का संरक्षण और क्रमबद्धता नहीं कर पाती है। अत: मीना, पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के पूर्व संक्रियात्मक विकास की अवस्था में है।
- जीन पियाजे ने पूर्व संक्रियात्मक अवस्था बच्चों में 2 से 7 वर्ष तक माना है। इस अवस्था में बालक संकेत तथा चिह्न को मस्तिष्क में ग्रहण करते हैं तथा उनका प्रयोग भी करते हैं। बालक आवाज सूनकर वस्तु का पता लगा पाते है।
- जीन पियाजे के संज्ञानात्मक अवस्था-
- (i) ज्ञानात्मक क्रियात्मक अवस्था (Sensory-motor stage)- 0- 2 वर्ष – इस अवस्था में, शिशु अपनी इंद्रियों के साथ-साथ वस्तुओं के साथ शारीरिक संबंधों का उपयोग करके दुनिया के बोध का निर्माण करते हैं।वस्तु स्थायित्व का विकास इस चरण की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है।
- (ii) पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (Pre Operational stage) – 2-7 वर्ष -बच्चों में स्मृति, जिज्ञासा और कल्पना का विकास होता है।वे चीजों को प्रतीकात्मक रूप से समझने में सक्षम होते हैं (घर घर खेलना, चाय पार्टी करना)। सोचने में अहंकारिता होती है और दूसरे के दृष्टिकोण पर विचार नहीं करते हैं।
- (iii) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Stage of concrete)-7-12 वर्ष -अपने स्वयं के विचारों और दूसरों के विचारों के बीच अंतर करने की क्षमता विकसित होती है और बच्चे वस्तुओं को उनकी संख्या, द्रव्यमान आदि के आधार पर वर्गीकृत कर सकते हैं | इस अवस्था में वस्तुओं और घटनाओं के बारे में तार्किक रूप से सोचने की क्षमता विकसित होती है |
- (iv) औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था (Stage of formal op- eration) 12 वर्ष से ऊपर-इस अवस्था में अमूर्त और वैज्ञानिक चिंतन विकसित होती है | यह सबसे महत्वपूर्ण अवस्था है जहां मानसिक क्षमताओं को अधिकतम स्तर तक विकसित किया जा सकता है।अमूर्त रूप से सोचने, बहुसंज्ञान और समस्या को समाधान करने की क्षमता विकसित होना इस चरण की प्रमुख क्षमताये है |
Practice Child Development & Pedagogy One Liner For Revision
- शिक्षा मनोविज्ञान आवश्यक है – शिक्षा एवं अभिभावकों के लिए
- शिक्षा मनोविज्ञान का मुख्य सम्बन्ध सिखने से है 1 यह कथन है – सारे एवं टेलफ़ोर्ड का
- मनोविज्ञान की आधारशिला किस पुस्तक में राखी गई- मनोविज्ञान के सिद्धान्त
- अमेरिका में प्रकाशित ‘Principal of Psychology’ के लेखक हैं – विलियम जेम्स
- शिक्षा मनोविज्ञान का वर्तमान स्वरुप है – व्यापक
- गौरिसन के अनुसार शिक्षा मनोविज्ञान का उदेश्य है – व्यवहार का ज्ञान
- कुप्पूस्वामी के अनुसार शिक्षा मनोविज्ञान के सिद्धान्तों का सर्वोत्तम प्रयोग होता है – उत्तम शिक्षा एवं उत्तम अधिगम में
- शिक्षा मनोविज्ञान का प्रमुख उदेश्य कोलेसनिक के अनुसार है – शिक्षा की समस्याओं का समाधान करना
- कैली के अनुसार शिक्षा मनोविज्ञान के उदेश्य हैं – नौ
- स्किनर के अनुसार शिक्षा मनोविज्ञान के सामान्य उदेश्य हैं – बाल विकास
- स्किनर के अनुसार शिक्षा मनोविज्ञान के विशिष्ट उदेश्य हैं – बालकों के वांछनीय व्यवहार के अनुरूप शिक्षा के स्तर एवं उदेश्यों को निश्चित करने में सहायता करना
- शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र में वह सभी ज्ञान और विधियां सम्मिलित हैं जो सिखने की प्रक्रिया से अधिक अच्छी प्रकार समझने में सहायक हैं 1 यह कथन है – ली का
- गेट्स के अनुसार शिक्षा मनोविज्ञान की सिमा है – अस्थिर एवं परिवर्तनशील
- “अवस्था विशेष के आधार पर ही हमें किसी को बालक युवा या वृद्ध कहना चाहिए 1” यह कथन है – फ्रॉबेल का
- हरबर्ट के अनुसार शिक्षा सिद्धान्तों का आधार होना चाहिए – मनोवैज्ञानिक
- माण्टेसरी के अनुसार एक अध्यापक द्वारा उस स्थिति में ही शिक्षण कार्य प्रभावी ढंग से किया जा सकता है, जब उसे ज्ञान होगा – मनोविज्ञान के प्रयोगात्मक स्वरुप का
- वर्तमान समय में शिक्षा मनोविज्ञान की आवश्यकता है – बाल केन्द्रित शिक्षा
- वर्तमान समय में शिक्षा मनोविज्ञान की आवश्यकता समझी जाती है – सर्वांगीण विकास में
- शिक्षा मनोविज्ञान का प्रमुख लाभ है – शिक्षक शिक्षार्थी मधुर सम्बन्ध
- कक्षा में छात्रों को उनकी विभिन्नताओं के आधार पर पहचानने के लिए शिक्षक को ज्ञान होना चाहिए – शिक्षा मनोविज्ञान का
- समय सरणी में गणित, विज्ञान या कठिन विषय के कालांश पहले क्यों रखे जाते हैं – मनोविज्ञान के आधार पर
- सफल एवं प्रभावशाली शिक्षा अधिगम प्रक्रिया के लिए आवश्यक है- शिक्षण अधिगम सामग्री का प्रयोग एवं शिक्षा मनोविज्ञान के सिद्धान्तों का प्रयोग
- निर्देशन एवं परामर्श में किस विषय का अधिक उपयोग किया जाता है – शिक्षा मनोविज्ञान का
- छात्रों की योग्यता एवं रूचि के आधार पर पाठ्यक्रम निर्माण में योगदान होता है – शिक्षा मनोविज्ञान का
- बुद्धि परीक्षण विषय है – शिक्षा मनोविज्ञान का
- शिक्षक मनोविज्ञान के ज्ञान द्वारा बालकों की – बुद्धि तथा रुचियों की जानकारी करके शिक्षा देता है, प्रकृति को जान कर शिक्षा देता है और आर्थिक स्तिथि तथा पारिवारिक स्थिति की जानकारी लेकर शिक्षा देता है
- मनोविज्ञान का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान है – अब शिक्षा बाल केन्द्रित हो गई है, शिक्षक बालकों से निकट का संम्पर्क स्थापित करने का प्रयास करता है और शिक्षक को छात्रों की आवश्यकता का ज्ञान हो सकता है 1
- शिक्षा मनोविज्ञान एक विज्ञान है – शैक्षिक सिद्धान्तों का
- शिक्षा मनोविज्ञान की उत्पति मानी जाती है – वर्ष 1900
- ‘मनोविज्ञान’ शब्द के समानान्तर अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘साइकोलॉजी’ की व्युत्पत्ति किस भाषा से हुई है – ग्रीक भाषा से
- शिक्षा मनोविज्ञान का सम्बन्ध है – शिक्षा से, दर्शन से और मनोविज्ञान से
- शिक्षा का शाब्दिक अर्थ है – पालन-पोषण करना, सामने लाना और नेत्रित्व देना
- “मनोविज्ञान वातावरण के सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों के क्रियाकलापों का विज्ञान है 1” यह कथन है – वुडवर्थ का
- “मनोविज्ञान शिक्षा का आधारभूत विज्ञान है” यह कथन है – स्किनर का
- शिक्षा मनोविज्ञान की विषय-सामग्री कस सम्बन्ध है – सीखना
- शिक्षा मनोविज्ञान में जिन बालकों के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है, वह है – मंद बुद्धि, पिछड़े हुए और समस्यात्मक
- सिखने की प्रक्रिया के अन्तर्गत शिक्षा मनोविज्ञान अध्ययन करता है – प्रेरणा व् पुर्नबलन के प्रभाव का अध्ययन
- “मनोविज्ञान मन का विज्ञान है 1” यह कथन है – अरस्तू का
- “शिक्षा मनोविज्ञान, अधियापको की तैयारी की आधारशिला है 1” यह कथन है – स्किनर का
- आंकड़ों का व्यवस्थापन करने हेतु संकलित आंकड़ों के संबन्ध में निम्नलिखित कार्य करना होता है – वर्गीकरण, सारणीयन, आलेखी निरूपण
- मनोविज्ञान शिक्षा के क्षेत्र में सहायता देता है तथा बताता है – शिक्षा के उदेश्य सम्भावित हैं अथवा नहीं
- शिक्षा मनोविज्ञान का अध्ययन अध्यापक को इसलिए करना चाहिए, ताकि – इसकी सहायता से अपने शिक्षण को अधिक प्रभावशाली बना सके
- “मनोविज्ञान व्यवहार का शुद्ध विज्ञान है ल” इस परिभाषा के प्रतिपादक हैं- ई० वाटसन
- अचेतन मन का अध्ययन किया जाता है- मनोविश्लेषण विधियों द्वारा
- मनोविश्लेषणात्मक प्रणाली के जन्मदाता हैं – सिंगमण्ड फ्रायड
- वर्तमान समय में मनोविज्ञान है- व्यवहार का विज्ञान
- शिक्षा मनोविज्ञान का विषय क्षेत्र नहीं है – शैक्षिक मूल्यांकन
- ‘शिक्षा किसी निश्चित स्थान पर प्राप्त की जाती है 1’ यह कथन शिक्षा के किस अर्थ में प्रयुक्त होता है – शिक्षा का संकुचित अर्थ
- ‘साइकी’ का अर्थ है – मानवीय आत्मा या मन
- मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान कहा- वाटसन ने
- “मनोविज्ञान मन का वैज्ञानिक अध्ययन है, जिसके अन्तर्गत न केवल बौद्धिक, अपितु संवेगात्मक अनुभूतियों, उत्प्रेरक शक्तियों तथा कार्य या व्यवहार भी सम्मिलित है 1” यह कथन है – सी० डब्लयू० वैलेंटाइन का
- मनोविज्ञान – आत्मा का विज्ञान है, मन का विज्ञान है, चेतना का विज्ञान है
- मानव मन को प्रभावित करने वाला करक है – व्यक्ति की रुचियाँ, अभिक्षमताए अभियोग्यताए व् वातावरण है
- मनोविज्ञान को शुद्ध विज्ञान मन है – जेम्स ड्रेवर ने
- शिक्षा मनोविज्ञान – मनोविज्ञान का एक अंग है
- शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति से सम्बन्ध में कहा जा सकता है – यह सर्वव्यापी है तो सार्वभौमिक भी
- मनोविज्ञान के अंतर्गत – मानव का अध्ययन किया जाता है
- शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन के उदेश्य है – विद्यार्थियों द्वारा किसी बात के सीखे जाने को प्रभावित करना
- मनोविज्ञान शिक्षा के क्षेत्र में सहायता देता है तथा स्पष्ट करता है – शिक्षा के उदेश्य की सम्भावना
- शिक्षक को शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन की प्रत्यक्ष आवश्यकता नहीं है – शारीरिक सुडौलता
- मनोइयाँ का सम्बन्ध प्राणिमात्र के व्यवहार के अध्ययन से है, जबकि शिक्षा मनोविज्ञान का क्षेत्र – मानवीय व्यवहार के अध्ययन से है, शैक्षिक संस्थितियों में मानव व्यवहार से है
- शिक्षण प्रक्रिया के अंग है – शिक्षण के उदेश्य, शिक्षण को सार्थक बनाने वाले ज्ञानानुभव, शिक्षण का मूल्यांकन
- शिक्षा मनोविज्ञान का मूल उदेश्य है – विद्यार्थियों योग्यताओं एवं क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए उनके द्वारा किसी बात को सीखे जाने से संबन्धित बात को प्रभावित करता है
- शिक्षा का सम्बन्ध है – शिक्षा के उदेश्य से और कक्षा पर्यावरण व् वातावरण से
- शिक्षा मनोविज्ञान का क्षेत्र है – व्यापक
- शिक्षा मनोविज्ञान के सामान्य उदेश्य है – बालक के व्यक्तित्व का विकास, शिक्षण कार्य में सहायता और शिक्षण विधियों में सुधार
- “अवस्ता विशेष के अनुभवों के आधार पर ही हमें किसी को बालक, युवा एवं वृद्ध कहना चाहिए 1” यह कथन है – फ्रोबेल का
- शिक्षा मनोविज्ञान का प्रमुख उदेश्य है – बाल केन्द्रित शिक्षा का विकास
- बालक के विकास की प्रक्रिया कब शुरु होती है – जन्म से पूर्व
- विकास की प्रक्रिया – जीवन पर्यन्त चलती है।
- सामान्य रूप से विकास की कितनी अवस्थाएं होती हैं – पांच
- “वातावरण में सब बाह्य तत्व आ जाते हैं जिन्होंने व्यक्ति को जीवन आरंभ करने के समय से प्रभावित किया है।” यह परिभाषा किसकी है – वुडवर्थ की
- “वंशानुक्रम व्यक्ति की जन्मजात विशेषताओं का पूर्ण योग है – बी.एन.झा का
- वंशानुक्रम के निर्धारक होते हैं – जीन्स
- कौन-सी विशेषता विकास पर लागू नहीं होती है – विकास को स्पष्ट इकाइयों में मापा जा सकता है।
- शैशव काल का नियत समय है – जन्म से 5-6 वर्ष तक
- बालक की तीव्र बुद्धि का विकास पर क्या प्रभाव पड़ता है – विकास सामान्य से तीव्र होता है।
- विकास एक प्रक्रिया है – निरन्तर
- बाल्यावस्था में मस्तिष्क का विकास हो जाता है : – 90 प्रतिशत
- अन्तर्दर्शन विधि में बल दिया जाता है – स्वयं के अध्ययन पर
- बालक को आनन्ददायक सरल कहानियों द्वारा नैतिक शिक्षा प्रदान करनी चाहिए। यह कथन है – कोलेसनिक का
- विकास के सन्दर्भ में मैक्डूगल ने – मूल प्रवृत्यात्मक व्यवहार का विश्लेषण किया।
- जब हम किसी भी व्यक्ति के विकास के विषय में चिन्तन करते हैं तो हमारा आशय – उसकी कार्यक्षमतासे होता है, उसकी परिपक्वता से होता है, उसकी शक्ति ग्रहण करने से होता है।
- संवेगात्मक विकास में किस अवस्था में तीव्र परिवर्तन होता है – किशोरावस्था
- वृद्धि और विकास है – एक-दूसरे के पूरक
- चारित्रिक विकास का प्रतीक है – उत्तेजना
- विकासात्मक पद्धति को कहते हैं – उत्पत्ति मूलक विधि
- मानसिक विकास के लिए अध्यापक का कार्य है – बालकों को सीखनेके पूरे-पूरे अवसर प्रदान करें। छात्र-छात्राओं के शारीरिक स्वास्थ्य की ओर पूरा-पूरा ध्यान दें। व्यक्तिगत भेदों की ओर ध्यान देते हुए उनके लिए समुचित वातावरण की व्यवस्था करें।
- वाटसन ने नवजात शिशु में मुख्य रूप से किन संवेगों की बात कही है – भय, क्रोध व स्नेह
- किशोरावस्था की मुख्य समस्याएं हैं – शारीरिक विकास की समस्याएं, समायोजन की समस्याएं, काम और संवेगात्मक समस्याएं
- शैशवावस्था है – जन्म से 7 वर्ष तक
- शिशु का विकास प्रारम्भ होता है – गर्भकाल में
- बाल्यावस्था के लिए पर्याप्त नींद होती है – 8 घण्टे
- बालिकाओं की लम्बाई की दृष्टि से अधिकतम आयु है – 16 वर्ष
- बालक के विकास को जो घटक प्रेरित नहीं करता है, वह है – वंशानुक्रम या वातावरण दोनों ही नहीं
- किसके विचार से शैशवावस्था में बालक प्रेम की भावना, काम प्रवृति पर आधारित होती है – फ्रायड
- रॉस ने विकास ने विकास क्रम के अन्तर्गत किशोरावस्था का काल निर्धारित किया है – 12 से 18 वर्ष तक
- किशोरावस्था की प्रमुख विशेषता नहीं हैं – मानसिक विकास
- बालकों के विकास की किस अवस्था को सबसे कठिन काल के रूप में माना जाता है – किशोरावस्था Bal Vikas Shiksha Shastra Notes
- उत्तर बाल्याकाल का समय कब होता है – 6 से 12 वर्ष तक
- बाल्यावस्था की प्रमुख विशेषता नहीं है – अन्तर्मुखी व्यक्तित्व
- संवेगात्मक विकास में किस अवस्था में तीव्र परिवर्तन होता है – किशोरावस्था
- विकासवाद के समर्थक हैं – डिके एवं बुश, गाल्टन, डार्विन
- विकास का तात्पर्य है – वह प्रक्रिया जिसमें बालक परिपक्वता की ओर बढ़ता है।
- Age of Puberty कहलाता है – पूर्ण किशोरावस्था
- व्यक्ति के स्वाभाविक विकास को कहते है – अभिवृद्धि
- बालक के विकास की प्रक्रिया एवं विकास की शुरुआत होती है – जन्म से पूर्व
- “विकास के परिणामस्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएं और नवीन योग्यताएं प्रकट होती है।” यह कथन है – हरलॉक का
- शैक्षिक दृष्टि से बाल विकास की अवस्थाएं है – शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था
- स्किनर का मानना है कि “विकास के स्वरूपों में व्यापक वैयक्तिक भिन्नताएं होती हैं। यह विचार विकास के किस सिद्धांत के संदर्भ में हैं – व्यक्तिगत भिन्नता का सिद्धान्त
- मनोविश्लेषणवाद (Psyco Analysis) के जनक थे – फ्रायड
- “मुझे बालक दे दीजिए। आप उसे जैसा बनाना चाहते हों, मैं उसे वैसा ही बना दूंगा।” यह कहा था – वाटसन ने
- सिगमण्ड फ्रायड के अनुसार, निम्न में से मन की तीन स्थितियों हैं – चेतन, अद्धचेतन, अचेतन
- इड (ID), ईगो (Ego), एवं सुपर इगो (Super Ego) को मानव की संरचना का अभिन्न भाग मानता है – फ्रायड
- केवल दो प्रकार की मूल प्रवृत्ति है – मृत्यु एवं जीवन। यह विचार है – फ्रायड
- रुचियों, मूल प्रवृत्तियों एवं स्वाभाविक संवेगों का स्वस्थ विकास हो सकता है यदि – वातावरण जिसमें वह रहता है, स्वस्थ हो
- मूल प्रवृत्ति की प्रमुख विशेषता पायी जाती है – समस्त प्राणियों में पायी जाती है, यह जन्मजात एवं प्रकृति प्रदत्त होती है।
- व्यक्ति के स्वाभाविक विकास को कहते हैं – अभिवृद्धि
- विकास का अभिप्राय है – वह प्रक्रिया जिसमेंबालक परिपक्वता की ओर बढ़ता है।
- संवेग शरीर की वह जटिल दशा है जिसमें श्वास, नाड़ी तन्त्र, ग्रन्थियां, मानसिक स्थिति, उत्तेजना, अवबोध आदि का अनुभूति पर प्रभाव पड़ता है तथा पेशियां निर्दिष्ट व्यवहार करने लगती हैं। यह कथन है – ग्रीन का
- “वातावरण में सब बाह्य तत्व आ जाते हैं, जिन्होंने व्यक्ति को आरम्भ करने के समय में प्रभावित किया है।” यह परिभाषा है – बुडवर्थ की
- “विकास के परिणामस्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएं और नवीन योग्यताएं प्रगट होती हैं।” यह कथन है – हरलॉक का
- शैक्षिक दृष्टि से बालक के विकास की अवस्थाएं हैं – शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था
- शैशवावस्था की प्रमुख मनोवैज्ञानिक विशेषता क्या है – मूल प्रवृत्यात्मक व्यवहार
- शैशवावस्था में सीखने की प्रक्रिया का स्वरूप होता है – सीखने की प्रक्रिया में तीव्रता होती है।
- बाल्यावस्था का समय है – 5 से 12 वर्ष तक Bal Vikas Shiksha Shastra Notes
- बाल्यावस्था की प्रमुख मनोवैज्ञानिक विशेषता क्या है – सामूहिकता की भावना
- बाल्यावस्था में सामान्यतः बालक का व्यक्तित्व होता है – बहिर्मुखी व्यक्तित्व
- बाल्यावस्था में शिक्षा का स्वरूप होना चाहिए – सामूहिक खेलों एवं रचनात्मक कार्यों के माध्यम से शिक्षा दी जानी चाहिए।
- मानव की वृद्धि एवं विकास की प्रक्रियानिम्न में से किस सिद्धान्त पर आधारित है – विकास की दिशा का सिद्धान्त, परस्पर सम्बन्ध का सिद्धान्त, व्यक्तिगत भिन्नताओं का सिद्धान्त
- “बालक की अभिवृद्धि जैविकी नियमों के अनुसार होती है।” यह कथन है – हरलॉक का
- निम्न में से कौन-सा कारक व्यक्ति की वृद्धि या विकास को प्रभावित करता है – ग्रीन का
- “पर्यावरण बाहरी वस्तु है जो हमें प्रभावित करती है।” यह विचार है – रॉस का
- बुद्धि-लब्धि के लिए विशिष्ट श्रेय किस मनोवैज्ञानिक को जाता है – स्टर्न
- शैशवावस्था को जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण काल क्यों कहा जाता है – यह अवस्था वह आधार है जिस पर बालक के भावी जीवन का निर्माणहोता है।
- जैसे-जैसे बालक की आयु का विकास होता है वैसे-वैसे उसके सीखने का क्रम निम्नलिखित की ओर चलता है – सूझ-बूझ की ओर
- निम्न में से कौन-सा कथन सही नहीं है – विकास संख्यात्मक
- निम्न में से कौन-सा कथन सही है – वृद्धि, विकास को प्रभावित करती है।
- जिस आयु में बालक की मानसिक योग्यता का लगभग पूर्ण विकास हो जाता है, वह है – 14 वर्ष
- “मस्तिष्क द्वारा अपनी स्वयं की क्रियाओं का निरीक्षण किया जाता है।” – आत्म-निरीक्षण विधि
- विकासात्मक पद्धति को कहते हैं – उत्पत्तिमूलक विधि
- प्रयोगात्मक विधि में सामना नहीं करना पड़ता है – समस्या का चुनाव
- मानव विकास जिन दो कारकों पर निर्भर करताहै, वह है – जैविक और सामाजिक
- शिक्षक बालकों की पाठ में रुचि उत्पन्न कर सकता है – संवेगों से
- वैयक्तिक भेदों का अध्ययन तथा सामान्यीकरण का अध्ययन किया जाता है – विभेदात्मक विधि में
- एक माता-पिता के अलग-अलग रंग की संतान होती हैं, क्योंकि – जीव कोष के कारण
- बाल विकास को सबसे अधिक प्रेरित करने वाला प्रमुख घटक है – बड़ा भवन
- बाल विकास को प्रेरित करने वाला घटक नहीं है – परिपक्वता
- वातावरण के अन्तर्गत आते हैं – हवा, प्रकाश, जल
- कितने माह का शिशु प्रौढ़ व्यक्ति की मुख मुद्रा को पहचानने लगता है – 4-5 मास का शिशु
- मानसिक विकास के लिए अध्यापक का कार्य है – बालकों को सीखने के पूरे-पूरे अवसर प्रदान करें। छात्र-छात्राओंके शारीरिक स्वास्थ्य की ओर पूरा-पूरा ध्यान दें। व्यक्तिगत भेदों की ओर ध्यान देते हुए उनके लिए समुचित वातावरण की व्यवस्था करें।
- शैशवावस्था होती है – जन्म से 7 वर्ष तक
- वाटसन ने नवजात शिशु में मुख्य रूप में किन संवेगों की बात कही है – भय, क्रोध व स्नेह
- जब माता-पिता के बच्चे उनके विपरीत विशेषताओं वाले विकसित होते हैं, तो यहां पर सिद्धान्त लागू होता है – प्रत्यागमन का
- समानता के नियम के अनुसार माता-पिता जैसे होते हैं, उनकी सन्तान भी होती है – माता-पिता जैसी Bal Vikas Shiksha Shastra Notes
- शिशु का विकास प्रारम्भ होता है – गर्भकाल में
- सामाजिक स्थिति वंशानुक्रमणीय – होती है।
- बालक की मूल शक्तियों का प्रधान कारक है – वंशानुक्रम
- वंश का बुद्धि पर प्रभाव देखनेके लिए सैनिकों के वंशज का अध्ययन किया – गोडार्ड ने
- मूल प्रवृत्ति का प्रतीक होता है – संवेग
- बाल विकास की दृष्टि से सर्वाधिक समस्या का काल होता है – शैशवावस्था
- “बालक की अभिवृद्धि जैविकीय नियमों के अनुसार होती है।” यह कथन है – क्रोगमैन का
- बालक के विकास को जो घटक प्रेरितनहीं करता है, वह है – वंशानुक्रम या वातावरण दोनों की नहीं।
- किसके विचार से शैशवावस्था में बालक प्रेम की भावना, काम प्रवृत्ति पर आधारित होता है – फ्रायड
- “वंशानुक्रम माता-पिता से सन्तान को प्राप्त होने वाले गुणों का नाम है।” यह परिभाषा है – रूथ बैन्डिक्ट की
- “विकास के परिणामस्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएं और नवीन योग्यताएं प्रस्फुटित होती है।” यह कथन है – हरलॉक का
- “वातावरण वह प्रत्येक वस्तु, जो व्यक्ति के जीन्स के अतिरिक्त प्रत्येक वस्तु को प्रभावित करती है।” यह कथन है – एनास्टासी का
- “वंशानुक्रम हमें विकसित होने की क्षमता प्रदान करता है।” यह कथन है – लेण्डिस का
- जीवन की प्रत्येक घटना का वंशानुक्रम एवं वातावरण से किस विद्वान ने संबंधित किया है – पेज एवं मैकाइवर ने
- यह मत किसका है -“शिक्षक को अपने कार्य के सफल सम्पादन के लिए व्यावहारिक मनोविज्ञान का ज्ञान होना चाहिए।” – माण्टेसरी का
- वर्तमान समय में विद्यालयों में मैत्री और प्रसन्नता का जो वातावरण दिखता है, उसका कारण है – मनौवैज्ञानिक उपचार
- यह विचार किसका है – “क्योंकि दो बालकों में समान योग्यताएं या समान अनुभव नहीं होते हैं, इसीलिए दो व्यक्तियों में किसी वस्तु या परिस्थिति का समान ज्ञान होने की आशा नहीं की जा सकती।” – हरलॉक का
- लड़कियों में बाह्य परिवर्तन किस अवस्था में होने लगते हैं – किशोरावस्था
- बालक के सामाजिक विकास में सबसे महत्वपूर्ण कारक हैं – वातावरण
- व्यक्तिगत भेद को ज्ञात करने की विधियां हैं – बुद्धि परीक्षण, व्यक्ति इतिहास विधि, रुचि परीक्षण
- बालक से यह कहना ‘घर गन्दा मत करो’ कैसा निर्देश है – निषेधात्मक
- बाल्यावस्था के दो भाग कौन-कौन से हैं – पूर्व बाल्यावस्था तथा उत्तर बाल्यावस्था
- सात वर्ष की आयु में पहुंचते-पहुंचते एक सामान्य बालक का शब्द भण्डार हो जाता है, लगभग – 6000 शब्द
- संकल्प शक्ति के कितने अंग हैं – तीन
- बालक के समाजीकरण का प्राथमिक घटक है – क्रीड़ा स्थल
- बालक के चारित्रिक विकास के स्तर हैं – मूल प्रवृत्यात्मक, पुरस्कार व दण्ड, सामाजिकता
- उत्तर बाल्यकाल का समय कब होता है – 6 से 12 वर्ष तक
- “बालक की शक्ति का वह अंश जो किसी काम में नहीं आता है, वह खेलों के माध्यम से बाहर निकाल दिया जाता है।” यह तथ्य कौन-सा सिद्धान्त कहता है – अतिरिक्त शक्ति का सिद्धान्त
- भाषा विकास के विभिन्न अंग कौन से हैं – अक्षर ज्ञान, सुनकर भाषा समझना, ध्वनि पैदा करके भाषा बोलना Bal Vikas Shiksha Shastra Notes
- स्टर्न के अनुसार खेल क्या है – खेल एक ऐच्छिक, आत्म-नियन्त्रित क्रिया है।
- संवेगात्मक स्थिरता का लक्षण है – भीरू
- अभिप्रेरणा का महत्व है – रुचि के विकास में, चरित्र निर्माण में, ध्यान केन्द्रित करने में
- भाषा विकास के क्रम में अन्ति क्रम (सोपान) है – भाषा विकास की पूर्णवस्था
- शिक्षा का कार्य है – अर्जित रुचियों को स्वाभाविक बनाना।
- बालक के सामाजिक विकास में सबसे महत्वपूर्ण कारक कौन-सा है – वातावरण
- संवेगात्मक विकास में किस अवस्था में तीव्र परिवर्तन होता है – किशोरावस्था
- बालक का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और संवेगात्मक विकास किस अवस्था में पूर्णता को प्राप्त होता है – किशोरावस्था
- चरित्र को निश्चित करने वाला महत्वपूर्ण कारक है – मनोरंजन सम्बन्धी कारक
- जिस आयु मेंबालक की मानसिक योग्यता का लगभग पूर्ण विकास हो जाता है, वह है – 14 वर्ष
- शिक्षा की दृष्टि से बाल की महत्वपूर्ण आवश्यकता क्या है – बालकों के साथ मनोवैज्ञानिक व्यवहार की आवश्यकता
- मानव शरीर का आकार किस ग्रन्थि की सक्रियता से बढ़ता है – पिनीयल ग्रन्थि से
- बालक की वृद्धि रुक जाती है – शारीरिक परिपक्वता प्राप्त करने के बाद
- “दो बालकों में समान मानसिक योग्यताएं नहीं होती।” यह कथन है – हरलॉक का
- “संवेदना ज्ञान की पहली सीढ़ी है।” यह – मानसिक विकास है।
- तर्क, जिज्ञासा तथा निरीक्षण शक्ति का विकास होता है – 11 वर्ष की आयु में
- “Introduction of Psychology” नामक पुस्तक लिखी है – हिलगार्ड तथा एटकिसन ने
- व्यक्ति के स्वाभाविक विकास को कहते हैं – अभिवृद्धि
- ‘ईमोशन’ शब्द का अर्थ है – उत्तेजित करना, उथल-पुथल पैदा करना, हलचल मचाना।
- ‘संवेग अभिप्रेरकों का भावनात्मक पक्ष है।’ यह कथन है – मैक्डूगल का
- ‘संवेग प्रकृति का हृदय है।’ यह कथन है – मैक्डूगल का
- ‘Physical and Character’ पुस्तक के लेखक हैं – थार्नडाइक
- संवेगहीन व्यक्ति को माना जाता है – पशु
- “सत्य अथवा तथ्यों के दृष्टिकोण से उत्तम प्रतिक्रिया का बल ही बुद्धि है।” बुद्धि की यह परिभाषा है – थार्नडाइक की
- सांवेगिक स्थिरता में किस वस्तु के प्रति निर्वेद अधिगम को बढ़ाते हैं – साहस, जिज्ञासा, भौतिक वस्तु
- कोई व्यक्ति डॉक्टर बनने की योग्यता रखता है तो कोई व्यक्ति शिक्षक बनने की योग्यता। यह किस कारण से होती है – अभिरुचि के कारण
- बाल्यावस्था में शिक्षा का स्वरूप होना चाहिए – सामूहिक खेलों एवं रचनात्मक कार्यों के माध्यम से शिक्षा दी जानी चाहिए।
- एडोलसेन्स शब्द लैटिन भाषा के एडोलेसियर क्रिया से बना है, जिसका तात्पर्य है – परिपक्वता का बढ़ना
- किशोरावस्था का समय है – 12 से 18 तक
- मानव की वृद्धि एवं विकास की प्रक्रिया निम्न में से किस सिद्धान्त पर आधारित है – विकास की दिशाका सिद्धान्त, परस्पर सम्बन्ध का सिद्धान्त, व्यक्तिगत भिन्नताओं का सिद्धान्त
- बालकों को वंशानुक्रम से प्राप्त होती है – वांछनीय एवं अवांछनीय आदतें
- पर्यावरण का निर्माण हुआ है – परि + आवरण
- बोरिंग के अनुसार जीन्स के अतिरिक्त व्यक्ति को प्रभावित करने वाली वस्तु है – वातावरण
- बुडवर्थ के अनुसार वातावरण का सम्बन्ध है – बाह्य तत्वों से
- किशोर की शिक्षा में किस बात पर विशेष ध्यानाकर्षण की आवश्यकता होती है – यौन शिक्षा पर, पूर्ण व्यावसायिक शिक्षा पर, पर्याप्त मानसिक विकास पर
- किशोरावस्था की विशेषताओं को सर्वोत्तम रूप में व्यक्त करने वाला एक शब्द है – परिवर्तन
- किशोरावस्था प्राप्त हो जाने पर, निम्न में से कौन-सा गुण बालक में नहीं आता है – अधिक समायोजन का
- किशोरावस्था के विकास को परिभाषित करने के लिए बिग एंड हण्ट ने किस शब्द को महत्वपूर्ण माना है – परिवर्तन
- किशोरावस्था में बालकों में सामाजिकता के विकास के सन्दर्भ में कौन-सा कथन असत्य है – वे परिवार के कठोर नियन्त्रण में रहना पसन्द करते हैं।
- निम्न में कौनसा कारक किशोरावस्था में बालक के विकास को प्रभावित करता है – खान-पान, वंशानुक्रम, नियमित दिनचर्या Bal Vikas Shiksha Shastra Notes
- ‘दिवास्वप्न’ किस संगठन तन्त्र में विकसित रूप प्राप्त करता है – पलायन
- “बालक की शक्ति का वह अंश जो किसी काम में नहीं आता है, वह खेलों के माध्यम से बाहर निकाल दिया जाता है।” यह तथ्य कौन-सा सिद्धान्त कहलाता है – अतिरिक्त शक्तिका सिद्धान्त
- निरंकुश राजतन्त्र में समाजीकरण की प्रक्रिया होगी – मन्द
- बालक के समाजीकरण में भूमिका होती है – परिवार की, विद्यालय की, परिवेश की
- जिस बुद्धि का कार्य सूक्ष्य तथा अमूर्त प्रश्नों का चिन्तन तथा मनन द्वारा हल करना है, वह है – अमूर्त बुद्धि
- किशोरावस्था में रुचियां होती है – सामाजिक रूचियां, व्यावसायिक रुचियां, व्यक्तिगत रुचियां
- जिस विधि के द्वारा बालक को आत्म-निर्देशन के माध्यम से बुरी आदतों को छुड़वाने का प्रयास किया जाता है, वह विधि है – आत्मनिर्देश विधि
- किस स्थिति में समाजीकरण की प्रक्रिया तीव्र होगी – धर्मनिरपेक्षता
- संवेगात्मक एवं सामाजिक विकास के साथ-साथ चलने की प्रक्रिया को किस विद्वान ने स्वीकार किया है – क्रो एण्ड क्रो
- खेल के मैदान को किस विद्वान ने चरित्र निर्माण का स्थल माना है – स्किनर तथा हैरीमैन ने
- चरित्र को निश्चित करने वाला महत्वपूर्ण कारक है – मनोरंजन संबंधी कारक
- समाजीकरण की प्रक्रिया को प्रभावित करते है – शिक्षा, समाज का स्वरुप, आर्थिक स्थिति
- सामान्य बुद्धि बालक प्राय: किस अवस्था में बोलना सीख जाते हैं – 11 माह
- पोषाहार योजना सम्बन्धित है – मिड डे मील योजना से
- मिड डे मील योजना का प्रमुख संबंध है – केन्द्र से
- मिड डे मील योजना का प्रमुख लक्ष्य है – बालक को पोषण प्रदान करना।
- सामान्य ऊर्जा में पोषण का अर्थ माना जाता है – सन्तुलित भोजन से
- पोषण के प्रमुख पक्ष हैं – सन्तुलित भोजन, नियमित भोजन
- पोषण का विकृत रूप कहलाता है – कुपोषण
- एक शिक्षक को पूर्ण ज्ञान होना चाहिए – पोषण का, पोषण के उपायों का, पोषक तत्वों का
- पोषण का सम्बन्ध होता है – शारीरिक एवं मानसिक विकास
- व्यापक अर्थ में पोषण का सम्बन्ध होता है – सन्तुलित भोजन से, स्वास्थ्यप्रद वातावरण एवं प्रकृति से
- पोषण का अभाव अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है – सामाजिक विकास को
- पोषण के अभाव में बालक का व्यवहार हो जाता है – चिड़चिड़ा, अमर्यादित
- सन्तुलित भोजन का स्वरुप निर्धारित होता है – आयु वर्ग के अनुसार
- अनुपयुक्त भोजन उत्पन्न करता है – कुपोषण
- सन्तुलित भोजन के लिए आवश्यक है – शुद्धता एवं नियमितता
- पोषण में वृद्धि के उपाय होते है – भोजन से सम्बन्धित, पर्यावरण से सम्बन्धित
- पोषण के उपायों में प्रभावशीलता के लिए आवश्यक है – शिक्षक सहयोग, अभिभावक सहयोग, विद्यार्थी सहयोग
- निम्नलिखित में कौन-सी विशेषता पोषण से सम्बन्धित है – सन्तुलित भोजन
- सन्तुलित भोजन के साथ पोषण के लिए आवश्यक है – स्वास्थ्यप्रद वातावरण, उचित व्यायाम, खेलकूद
- वह उपाय जो पोषण पर्यावरणीय उपायों से सम्बन्धित है – पर्याप्त निंद्रा, पर्याप्त व्यायाम, स्वास्थ्यप्रद वातावरण
- सन्तुलित भोजन की तालिका में मांसाहारी एवं शाकाहारी बालकों की स्थिति होती है – समान या असमान दोनों की नहीं।
- 1 से 3 वर्ष के बालक के लिए अन्न होना चाहिए – 150 ग्राम
- 7 से 9 वर्ष के मांसाहारी एवं शाकाहारी बालकों के लिए अन्न होना चाहिए – 250 ग्राम
- 7 से 9 वर्ष के बाल को किस स्वरुप के लिए 75 ग्राम हरी सब्जियों की आवश्यकता होती है – शाकाहारी एवं मांसाहारी दोनों के लिए
- सन्तुलित भोजन की तालिका में 1 से 9 वर्ष के लिए फलों की तालिका में वजन होता है – एक समान Bal Vikas Shiksha Shastra Notes
- सन्तुलित भोजन में पोषक तत्व होते है – प्रोटीन, विटामिन, वसा
- प्रोटीन सामान्य रूप से होती है – दो प्रकार की
- मांस से प्राप्त प्रोटीन को कहते है – जन्तु जन्य प्रोटीन
- कौन-सा स्रोत वनस्पतिजन्य प्रोटीन का है – जौ
- क्वाशियरकर नामक रोग उत्पन्न होता है – प्रोटीन की कमी से
- गन्ने के रस, अंगूर तथा खजूर से प्रमुख रूप से प्राप्त होती है – कार्बोज
- कार्बोज की अधिकता से कौन सा रोग उत्पन्न होता है – मोटापा, बदहजमी
- वसा के प्रमुख स्रोत हैं – वनस्पति तेल व सूखे मेवे
- शरीर को अधिक शक्ति प्रदान करता है – वसा
- खनिज लवणों की कमी से रक्त को नहीं मिल पाता है – हीमोग्लोबिन
- घेंघा नामक रोग उत्पन्न होता है – आयोडीन अथवा खनिज लवण की कमी से
- विटामिन का आविष्कार हुआ था – उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में
- विटामिन ए की कमी से बालकों में कौन-सा रोग होता है – रतौंधी
- विटामिन बी की कमी से होता है – बेरी-बेरी रोग
- पेलाग्रा रोग किस विटामिन की कमी से होता है – बी
- बी काम्पलेक्स कहा जाता है – B₁, B₂, B₂ को
- विटामिन ‘सी’ की कमी से कौन-सा रोग होता है – स्कर्वी
- विटामिन सी का प्रमुख स्रोत है – आंवला
- स्त्रियों में मृदुलास्थि रोग किस विटामिन की कमी से होता है – विटामिन डी
- विटामिन डी की कमी से उत्पन्न होता है – सूखा रोग
- सूखा रोग पाया जाता है – बालिकाओं में
- विटामिन ई की कमी से स्त्रियों में सम्भावना होती है – बांझपन, गर्भपात
- विटामिन ई की कमी से उत्पन्न होने वाला रोग है – नपुंसकता
- विटामिन K का प्रमुख स्त्रोत है – केला, गोभी, अण्डा
- विटामिन ‘के’ की सर्वाधिक उपयोगिता होती है – गर्भिणी स्त्री के लिए, स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए
- रक्त का थक्का न जमने का रोग किस विटामिन के अभाव से उत्पन्न होता है – विटामिन ‘के’
- जल हमारे शरीर में कितने प्रतिशत है – 70 प्रतिशत
- दूषित जल के पीने से उत्पन्न रोग है – पीलिया, डायरिया
- कार्य करने के लिए किस पदार्थ की आवश्यकता होती है – कार्बोज की, कार्बोहाइड्रेट की
- अध्यापक को पोषक के ज्ञान की आवश्यकता होती है – बाल विकास के लिए, छात्रों के रोगों की जानकारी के लिए, अभिभावकों को पोषण का ज्ञान प्रदान कराने के लिए।
- अभिभावकों को पोषण का ज्ञान कराने का सर्वोत्तम अवसर होता है – शिक्षक-अभिभावक गोष्ठी Bal Vikas Shiksha Shastra Notes
- पोषण की क्रिया को बाल विकास से सम्बद्ध करने के लिए आवश्यक है – निरन्तरता
- शारीरिक विकास के लिए निरन्तरता के रूप में उपलब्ध होना चाहिए – सन्तुलित भोजन, उचित व्यायाम
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