Child Development and Pedagogy notes in hindi आपके परीक्षाओ पर आधरित है आप इसकी तैयारी से सफलता प्राप्त कर सकते है | CTET प्ररीक्षा के माध्यम से आप शिक्षक बनने की पात्रता प्राप्त करते है | आज हम इस पोस्ट के माध्यम से बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र के कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों को देखेंगे जो आपके 2024 में पूछे जा सकते है |आप भी शिक्षक भर्ती परीक्षा की तैयारी करते हैं तो इस Ctet cdp important questions in hindi with answers पोस्ट को पूरा जरुर पढ़ें |
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के द्वारा शिक्षक पात्रता परीक्षा (सीटेट) आयोजित की जाती है | आप भी शिक्षक भर्ती परीक्षा की तैयारी करते हैं तो इस CTET Child Development & Pedagogy Notes and Study Material पोस्ट को पूरा जरुर पढ़ें | इस Ctet cdp important questions in hindi with answers पोस्ट को पूरा जरुर पढ़ें | CDP के प्रश्न शिक्षक पात्रता परीक्षा जैसे की – CTET, UPTET, HPTET, PSTET,BPSC TET ,MPTET ,etc में इससे सम्बंधित प्रश्न पूछे जाते हैं |इसलिए Child Development and Pedagogy Notes In Hindi इस पोस्ट के माध्यम से पूरा जरुर देखें |

Child Development and Pedagogy Notes In Hindi
विकास की अवधारणा क्या है और क्यों जरुरी है ?
विकास की अवधारणा विकास जीवनपर्यन्त चलने वाली एक निरन्तर प्रक्रिया है |विकास की प्रक्रिया में बालक का शारीरिक (Physical), क्रियात्मक (Motor), संज्ञानात्मक (Cognitive) भाषागत् (Language), संवेगात्मक (Emotional) एवं सामाजिक (Social) विकास होता है |
बालक में क्रमबद्ध रूप से होने वाले सुसंगत परिवर्तन की क्रमिक श्रृंखला को (Sequence Chain) ‘विकास’ कहते है |विकास के अभिलक्षण विकास एक जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है, जो गर्भधारण से लेकर मृत्युपर्यन्त होती रहती है |विकास बहु-आयामी (Multi-dimensional) होता है अर्थात् कुछ क्षेत्रों में यह बहुत तीव्र वृद्धि को दर्शाता है, जबकि कुछ अन्य क्षेत्रों में धीमी गति से होता है |
बालक की वृद्धि एवं विकास के बारे में शिक्षकों को पर्याप्त जानकारी इसलिए भी रखना अनिवार्य है, क्योंकि बच्चों की रुचियाँ, इच्छाएँ, दृष्टिकोण एवं एक तरह से उसका पूर्ण व्यवहार शारीरिक वृद्धि एवं विकास पर ही निर्भर करता है |
अरस्तू के अनुसार, “विकास आन्तरिक एवं बाह्य कारणों से व्यक्ति में परिवर्तन है।”
वृद्धि तथा विकास में क्या अंतर है ?
वृद्धि परिणाम आत्मक परिवर्तनों जैसे बच्चों के बड़े होने के साथ-साथ उनके आकार लंबाई ऊंचाई टेढ़ी में वृद्धि से है और विकास का मतलब परिणात्मक परिवर्तनों जैसे कार्य कुशलता कार्य क्षमता व्यवहार में सुधार इत्यादि से है | वृद्धि विकास की प्रक्रिया का एक चरण है और इसका क्षेत्र सीमित है परंतु विकास अपने आप में एक विस्तृत अर्थ रखता है और इसका भाग वृद्धि से है |
वृद्धि तथा विकास को प्रभावित करने वाले कारक -पोषण है जो बालक को विकास के लिए उचित मात्रा में प्रोटीन, वुसा, कार्बोहाइड्रेट, खनिज लवण इत्यादि की आवश्यकता होती है | विकास के घटक बौद्धिक विकास जितना उच्चतर होगा, हमारे अन्दर समझदारी, नैतिकता, भावनात्मकता, तर्कशीलता इत्यादि का विकास उतना ही उत्तम होगा |
विकास का अधिगम से सम्बन्ध ?
विकास का अधिगम से घनिष्ठ सम्बन्ध है ये सभी अधिगम को प्रभावित करते हैं |शारीरिक विकास, विशेषकर छोटे बच्चों में मानसिक व संज्ञानात्मक विकास में मददगार है। सभी बच्चों की खेल की गतिविधियों में सहभागिता उनके शारीरिक व मनो-सामाजिक विकास के लिए आवश्यक है |मानसिक और भाषायी विकास, सामाजिक विकास एवं अधिगम को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं |
बालकों का विकास एवं अधिगम एक निरन्तर प्रक्रिया है, जिसके साथ बालकों में उन सिद्धान्तों का भी विकास होता है, जो बच्चे प्राकृतिक व सामाजिक दुनिया के बारे में बनाते हैं |
बाल विकास की अवधारणा क्या है ?
बाल-विकास का सामान्य अर्थ बालकों का मानसिक व शारीरिक विकास होता है |विकास शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संज्ञानात्मक, भाषायी तथा धार्मिक इत्यादि होता है |विकास का सम्बन्ध गुणात्मक (कार्य कुशलता, ज्ञान, तर्क, नवीन विचारधारा) एवं परिमाणात्मक (लम्बाई में वृद्धि, भार में वृद्धि तथा अन्य) दोनों से है |
स्कीनर के अनुसार, “विकास एक क्रमिक एवं मन्दगति से चलने वाली प्रक्रिया है।”
हरलॉक के अनुसार, “बाल मनोविज्ञान का नाम बाल विकास इसलिए रखा गया क्योंकि विकास के अंतर्गत अब बालक के विकास के समस्त पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, किसी एक पक्ष पर नहीं।”
क्रो और क्रो के अनुसार, “बाल मनोविज्ञान वह वैज्ञानिक की वह शाखा है जिसमें जन्म से परिपक्वावस्था तक विकसित हो रहे मानव का अध्ययन किया जाता है।”
बाल विकास के सिद्धान्त के महत्वपूर्ण सिधांत कौन से है ?
निरन्तरता का सिद्धान्त में विकास ‘एक न रुकने वाली’ प्रक्रिया है जो माँ के गर्भ से ही यह प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है और मृत्युपर्यन्त चलती रहती है | एक छोटे से नगण्य आकार से अपना जीवन प्रारम्भ करके हम सबके व्यक्तित्व के सभी पक्षों-शारीरिक, मानसिक, सामाजिक आदि का सम्पूर्ण विकास इसी निरन्तरता के गुण के कारण भली-भांति सम्पन्न कर सकते हैं |
समान प्रतिमान का सिद्धान्त में बालको का विकास और वृद्धि उनकी अपनी वैयक्तिकता के अनुरूप होती है ,वे अपनी स्वाभाविक गति से ही वृद्धि और विकास के विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ते रहते हैं और इसी कारण उनमें पर्याप्त विभिन्नताएँ देखने को मिलती हैं। किसी के विकास की गति तीव्र और किसी की मन्द होती है।
गेसल के अनुसार, “दो व्यक्ति समान नहीं होते, परन्तु सभी बालकों में विकास का क्रम समान होता है।”
विकास क्रम की एकरूपता यह सिद्धान्त से विकास की गति एक जैसी न होने तथा पर्याप्त वैयक्तिक अन्तर पाए जाने पर भी विकास क्रम में कुछ एकरूपता के दर्शन होते हैं। जैसे मनुष्य जाति के सभी बालकों की वृद्धि सिर की ओर प्रारम्भ होती है। इसी तरह बालकों के गत्यात्मक और भाषा विकास में भी एक निश्चित प्रतिमान और क्रम के दर्शन किए जा सकते हैं।
वृद्धि एवं विकास की गति की दर एक-सी नहीं रहती विकास की प्रक्रिया जीवन-पर्यन्त चलती तो है, किन्तु इस प्रक्रिया में विकास की गति हमेशा एक जैसी नहीं होती।
शैशवावस्था के शुरू के वर्षों में यह गति कुछ तीव्र होती है, परन्तु बाद के वर्षों में यह मन्द पड़ जाती है। पुनः किशोरावस्था के प्रारम्भ में इस इस गति में तेजी अधिक समय तक नहीं बनी रहती। से वृद्धि होती है |
विकास सामान्य से विशेष की ओर चलता है विकास और वृद्धि की सभी दिशाओं में विशिष्ट क्रियाओं से पहले उनके सामान्य रूप होते हैं। जैसे अपने हाथों से कुछ चीज पकड़ने से पहले बालक इधर से उधर हाथ मारने या फैलाने की कोशिश करता है। इसी तरह शुरू में एक नवजात शिशु के रोने और चिल्लाने में उसके सभी अंग-प्रत्यंग भाग लेते हैं, परन्तु बाद में वृद्धि और विकास की प्रक्रिया के फलस्वरूप यह क्रियाएँ उसकी आँखों और वाक्तन्त्र (Vocal System) तक सीमित हो जाती है।
परस्पर सम्बन्ध का सिद्धान्त से विकास के सभी आयाम; जैसे- शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक आदि एक-दूसरे सम्बन्धित हैं। इनमें से किसी भी एक आयाम में होने वाला विकास अन्य सभी आयामों में होने वाले विकास को पूरी तरह प्रभावित करने की क्षमता रखता है। जैसे जिन बच्चों में औसत से अधिक वृद्धि होती है, वे शारीरिक और सामाजिक विकास की दृष्टि से भी काफी आगे बढ़े हुए पाए जाते हैं।
दूसरी ओर, एक क्षेत्र में पाई जाने वाली कमियाँ दूसरे क्षेत्र में हो रही प्रगति में बाधक सिद्ध होती है। यही कारण है कि शारीरिक विकास की दृष्टि से पिछड़े बालक संवेगात्मक, सामाजिक एवं बौद्धिक विकास में भी उतने ही पीछे रह जाते है।
एकीकरण का सिद्धान्त से विकास की प्रक्रिया एकीकरण के सिद्धान्त (Principle of Integration) का पालन करती है। इसके अनुसार, बालक पहले सम्पूर्ण अंग को और फिर अंग के भागों को चलाना सीखता है। इसके बाद वह उन भागों में एकीकरण करना सीखता है। सामान्य से विशेष की ओर बढ़ते हुए विशेष प्रतिक्रियाओं तथा कोशिशों को एक साथ प्रयोग में लाना सीखता है। उदाहरण के लिए, एक बालक पहले पूरे हाथ को, फिर अंगुलियों को फिर हाथ एवं अंगुलियों को एकसाथ चलाना सीखता है।
बालक की अपनी वृद्धि और विकास की गति को ध्यान में रखकर उसके आगे बढ़ने की दिशा और स्वरूप के बारे में भविष्यवाणी को जा सकती है |
आंशिक पुनर्बलन का सिद्धान्त के प्रतिपादक जॉन डोलार्ड नील मिलर हैं | पुनर्बलन से यह तात्पर्य है कि किसी अनुक्रिया (Response) को बार-बार दोहराने की सम्भावना का बढ़ना। यह सतत पुनर्बलन की अपेक्षा अधिक प्रभावी होता है। चूंकि पुनर्बलन के माध्यम से नवीन प्रतिक्रियाओं को भी जन्म मिलता है |