अगर आप CTET की परीक्षा देने जा रहे है और EVS (Environmental Studies) का टॉपिक वाइज अद्ययन करना चाहते हैं तो आपको यहाँ पर्यावरण अध्ययन(EVS) के विषयवार जानकारी देखें | पेडागोजी (शिक्षण-शास्त्र), पर्यावरण से जुड़े कॉन्सेप्ट और पढ़ाने के तरीकों जैसे अहम विषयों को कवर करने वाले ये नोट्स आसानी से सीखने और तेज़ी से रिविज़न करने के लिए बनाए गए हैं।
र्यावरण अध्ययन से आप CTET की परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त कर सकते है | आज की पोस्ट में CTET,BTET,MPTET,UPTET या अन्य शिक्षक संबंधी प्रतियोगिता परीक्षा में पूछे जाने वाले पर्यावरण अध्ययन(EVS) के महत्वपूर्ण क्वेश्चन और उनके उत्तर को देख पाएंगे। आप इस आर्टिकल EVS Study Notes Topic Wise For CTET and TETs Exam में दी जा रही विस्तृत जानकारी जरुर देखें |

EVS Study Notes Topic Wise For CTET and TETs Exam
Concept and scopes of Evs (पर्यावरण अध्ययन की अवधारणा एवं क्षेत्र)
Introduction (परिचय)
पर्यावरण अध्ययन (Environment)का अध्यापन राष्ट्रीय पाठ्यचर्या समिति ने 1975 के नीतिगत दस्तावेज” 10 वर्षीय स्कूल के लिए पाठ्यक्रम: एक रूपरेखा” अर्थात(The curriculum for the 10 year school: a framework)मैं सिफारिश की थी, कि एक एकल विषय पर्यावरण अध्ययन(evs) प्राथमिक स्तर पर पढ़ाया जाना चाहिए।
- पहले 2 वर्ष में( कक्षा 1-2 ) पर्यावरण अध्ययन प्राकृतिक और सामाजिक वातावरण दोनों को देखेगा, जबकि कक्षा 3 – 4 में सामाजिक अध्ययन और सामान्य विज्ञान के लिए अलग से होंगे Evs part 1 और Evs part 2 ।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National policy of education)1986 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF)1988 में भी प्राथमिक स्तर पर पर्यावरण अध्ययन के शिक्षण के लिए यही दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।
- NCF 2000मैं सिफारिश की थी कि पर्यावरण अध्ययन को एक एकीकृत पाठ्यक्रम के रूप में पढ़ाया जाए, प्राथमिक स्तर( कक्षा 3 -4 ) पर विज्ञान और सामाजिक अध्ययन के लिए अलग-अलग विषय ना बढ़ाए जाएं।
- वर्तमान एनसीएफ 2005 में पर्यावरण अध्ययन के लिए एकीकृत दृष्टिकोण को निरंतरता आगे मजबूत बनाने का आह्वान किया है।
पर्यावरण का अर्थ है वाह्य आवरण जो हमें चारों ओर से घेरे हुए हैं। अतः पर्यावरण से अभिप्राय उन सभी भौतिक दशाएं तथा तथ्यों से लिया जाता है जो हमें चारों ओर से घेरे हुए हैं।
पर्यावरण शिक्षा निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है अतः प्राथमिक स्तर से ही इसका शिक्षण आवश्यक है।
पर्यावरण अध्ययन की संकल्पना(NCF2005)Concept of environmental studies-
- बच्चों को प्राकृतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण के बीच संबंधों का पता लगाने और उन्हें समझने के लिए प्रशिक्षित करना।
- अवलोकन और चित्रों के आधार पर समझ विकसित करने के लिए अनुभव के माध्यम से उन में भौतिक, जैविक, सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू की समझ प्राप्ति की ओर अग्रसर करना।
- बच्चो को सामाजिक घटनाओं के प्रति जिज्ञासु बनाने हेतु संख्यात्मक क्षमता पैदा करने के लिए परिवार से शुरुआत कर पूरे संसार की समझ विकसित करते हुएआगे बढ़ाना।
- पर्यावरण के मुद्दों के बारे में जागरूकता विकसित करना।
- बुनियादी संख्यात्मक और मनो प्रेरणा कौशल(Psychomotor Skills) प्राप्त करने के लिए बच्चे को खोजपूर्ण और हाथों की गतिविधियों में संलग्न कराना अर्थात अवलोकन, वर्गीकरण आदि द्वारा।
- विभिन्न प्रकार के पर्यावरणीय मुद्दे जैसे- लिंगभेद, उत्पीड़न के मुद्दे, प्रदूषण, अनैतिक व्यवहार आदि को मूर्त घटनाओं से संबंधित कर उन्हें समझने की क्षमता का विकास कराना ताकि उनमें मानवीय अधिकारों, समानता और न्याय मूल्यों के लिए सम्मान विकसित हो।
- उन्हें इस योग्य बनाने की समानता, न्याय, मानव की गरिमा और अपने अधिकारों संबंधी मुद्दों को हल करने में सक्षम हो सके।
- पर्यावरण संरक्षण क्यों आवश्यक है? प्रदूषण क्या है? इसका समाधान कैसे हो सकता है? इन प्रश्नों के उत्तर की समझ विकसित करने के लिए पर्यावरण अध्ययन को प्राथमिक स्तर पर शामिल किया जाना आवश्यक है ।
- पर्यावरण को किसी प्रकार की हानि ना हो इसलिए इससे संबंधित अच्छी आदतों का विकास करने हेतु पर्यावरण अध्ययन आवश्यक है।
पर्यावरण अध्ययन विषय को बाल केंद्रित एवं एकीकृत करने के लिए इसमें लगभग 6 सामान्य विषयों का समावेश किया गया है जो इस प्रकार है।
1 परिवार और मित्र(Family and friends)
2 भोजन(Food)
3 आश्रय( shelter)
4 पानी( water)
5 यात्रा( travel)
6 चीजें जो हम बनाते हैं और करते हैं (Things we make and do)
पर्यावरण अध्ययन का क्षेत्र
- राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005(NCF 2005) बच्चों के स्कूली जीवन को बाहर के जीवन से जोड़ने का समर्थन करती है।
- पर्यावरण अध्ययन के विषय में तो यह पूरी तरह से सही है, क्योंकि पर्यावरण अध्ययन का ध्येय मात्र ज्ञान का अर्जन ही नहीं ,बल्कि इससे जुड़े सामाजिक, प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक मुद्दों पर एक संपूर्ण रूप से समझ बनाते हुए आवश्यक कौशलों के विकास द्वारा पर्यावरण संबंधी समस्याओं का समाधान करना भी है।
- पर्यावरण अध्ययन में पर्यावरण विज्ञान एवं सामाजिक विज्ञान का समावेश है । यह इन विषयों के सार को संकलित करके प्राकृतिक वातावरण तथा उसके भौतिक, रासायनिक एवं जैविक तत्व की पारस्परिक क्रियाओं को व्यवस्थित रूप से समझने तथा संचालित करने में सहायता करता है।
- पर्यावरण शब्द फ्रांसीसी फ्रेंच शब्द “इंवीरोनर”से लिया गया है जिसका अर्थ है पूरा परिवेश।
पर्यावरण अध्ययन का क्षेत्र (Scop of EVS)
1 पर्यावरण अध्ययन में हम प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, भूकंप, भूस्खलन चक्रवात आंधी के कारण एवं परिणाम को समझने एवं प्रदूषण के प्रभाव को कम करने के उपाय का अध्ययन करते हैं।
2 इसमें हम वनस्पति एवं जंतु के प्रकारों एवं उनकी सुरक्षा के बारे में अध्ययन करते हैं।
3 प्राकृतिक संपदा एवं उनकी समस्याओं का संरक्षण एवं सुरक्षा इसमें जल, मृदा, वन, खनिज, बिजली एवं परिवहन शामिल है।
4 पर्यावरण के अध्ययन क्षेत्र में ना सिर्फ पृथ्वी वरन अंतरिक्ष भी सम्मिलित है
5 मानव पर्यावरण संबंध पर्यावरण मुद्दों से संबंधित नीति एवं कानून का अध्ययन करते हैं ।
6 मौसम संबंधी अनेक कारण जैसे कि तापमान,, पवन, दाब, वर्षा, ओलावृष्टि, हिमपात ,पाला पड़ना भी पर्यावरण के जैविक घटकों को प्रभावित करते हैं जलवायु परिवर्तन के कारण आज अनेकों समस्याएं हमारे सामने प्रगट हो रही हैं, जिन्हें समझने तथा उनके निवारण हेतु मौसम विज्ञान के बारे में हम पर्यावरण अध्ययन में पढ़ते हैं ।
7 पर्यावरण का क्षेत्र काफी व्यापक होता है पर्यावरण अध्ययन को 3:00 व्यापक नियमों के अनुसार संचालित किया जाता है।
- पर्यावरण के बारे में सीखना।
- पर्यावरण के लिए सीखना।
- पर्यावरण के माध्यम से सीखना।
8 पर्यावरण अध्ययन का विस्तार पर्यावरण को सीखने के माध्यम की तरह प्रयोग करने से लेकर, इसकी सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए क्या किया जा सकता है इस की विषय वस्तु की व्यवस्था बच्चे के आसपास के परिचित अनुभवों से शुरू होकर बाहरी अपरिचित दुनिया की तरफ चलती है ।
9 पर्यावरण अध्ययन का क्षेत्र सिर्फ बच्चों को अपने पर्यावरण की खोज करके समझा ना ही नहीं बल्कि-
- सकारात्मक अभिवृत्तियो , मूल्यों एवं प्रथाओं जैसे कि धरती पर जीवन की रक्षा, प्यार, अपने और दूसरों की देखभाल, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, सामूहिक अधिगम की प्रशंसा, अपनेपन का भाव, सामाजिक दायित्व, संस्कृति के महत्व को समझने का विकास भी करना है।
- पर्यावरण की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए सकारात्मक तथा अनुकूल क्रियाओं की शुरुआत करना।
- संरक्षण की नीतियों को बढ़ावा देना तथा पर्यावरण को बढ़ावा देने वाले स्वभाव एवं आदतों को अपनाना ।
पर्यावरण अध्ययन का महत्व Significance of Evs
1 संपूर्ण शिक्षा का उद्देश्य बच्चों की मानसिक, भावनात्मक, सृजनात्मक, सामाजिक, शारीरिक आदि क्षमताओं का विकास करना है, यह सिर्फ कक्षाओं में रट्टा मार कर पढ़ने से नहीं होता बल्कि पर्यावरण के साथ जुड़ाव तथा अनुभव से होता है।
2 पर्यावरण अध्ययन के मुख्य केंद्र बिंदुओं में से एक है। बच्चों को वास्तविक संसार जिसमें वह रहते हैं से परिचित कराया जाए पर्यावरण अध्ययन की परिस्थितियां तथा अनुभव उन्हें अपने प्राकृतिक एवं मानव निर्मित प्रति देश की छानबीन करने तथा उससे जुड़ने में सहायता करते हैं।
3 हम अपने अस्तित्व एवं जीवन की निरंतरता के लिए अपने पर्यावरण पर निर्भर हैं। इस संदर्भ में प्रत्येक व्यक्ति का नैतिक कर्तव्य है कि हम अपने पर्यावरण की रक्षा एवं संरक्षण करें ऐसा करने के लिए इस बात की समझ अत्यंत आवश्यक है, कि हमारे पर्यावरण की संरचना क्या है, तथा इसका महत्व क्या है पर्यावरण अध्ययन इसमें सहायक होता है।
4 पर्यावरण अध्ययन बच्चों को पर्यावरण में होने वाली अनेक घटनाओं एवं क्रियाकलापों के बारे में अपनी समाज का विकास करने में सहायता करता है इसके द्वारा इन्हें सीखने के लिए प्रत्यक्ष अनुभव प्रदान किए जाते हैं।
5 पर्यावरण अध्ययन बच्चों को यह समझ प्रदान करता है कि हम किस प्रकार से अपने भौतिक, जैविक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक पर्यावरण के साथ पारस्परिक क्रियाकलाप करते हैं तथा उसके द्वारा प्रभावित होते हैं।
6 पर्यावरण अध्ययन का मुख्य लक्ष्य की बच्चों को इस योग्य बनाना ताकि वह पर्यावरण से संबंधित सभी मुद्दों को जानने समझने और संबंधित समस्याओं को हल करने में सक्षम हो सके।
7 यह बच्चों को कक्षा में सकारात्मक माहौल प्रदान करता है तथा सीखने के लिए प्रेरित करता है।
8 पर्यावरण अध्ययन शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को सरल और सुविधाजनक बनाने में सहायक है क्योंकि यह करके सीखने पर बल देता है।
9 पर्यावरण अध्ययन पाठ्यक्रम में हाथों से काम करने के महत्व और विरासत में प्राप्त शिल्प परंपराओं को प्रोत्साहित करने की जरूरत पर बल दिया गया है।
10 पर्यावरण अध्ययन NCF 2005 की चिंताओं में से एक को कम करने में भी मदद करता है, पाठ्यक्रम के बोझ को घटाना।
11 इसके अध्ययन से बच्चे गहनता से सोचते एवं सीखते हैं तथा अनुभवों का विश्लेषण करते हैं।
12 इस प्रकार के अनुभव बच्चों में सामूहिक कौशलों का विकास करने में सहायता करते हैं। यह उन्हें दल के साथ घुलने मिलने के कुछ प्राथमिक कौशलों का विकास करने में सहायता करते हैं, जैसे की दल के साथ काम करना, उनकी बात सुनना तथा उनसे बात करना सीखना आदि।
13 इसी के साथ बच्चों में दूसरों के दृष्टिकोण एवं विश्वासों के प्रति भावनाओं का विकास होता है। विचारों, अनुभवों लोगो, भोजन, भाषा, पर्यावरण तथा सबसे अधिक सामाजिक-सांस्कृतिक रिवाजों एवं आस्थाओं की कदर करना सीखते हैं।
14 अपने शुरुआती वर्षों में बच्चों के ऐसे अनुभव उन्हें बड़े होकर लोकतांत्रिक देश के अच्छे नागरिक बनने में सहायता करते हैं ।
15 अधिगम इर्द गिर्द के पर्यावरण, प्रकृति, वस्तु एवं लोगों के साथ क्रियाओं एवं भाषा के द्वारा संपर्क बनाने से होता है। खोजना तथा खुद काम करना, प्रश्न करना सुनना तथा सहक्रिय करना मुख्य क्रियाए हैं जिसके माध्यम से अधिगम होता है, पर्यावरण अध्ययन इसमें सहायक है ।
एकीकृत पर्यावरण अध्ययन(Integrated Evs)
1 हमारी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा( 1975, 1988, 2000, 2005) इस बात को ध्यान में रखकर बनाई गई है कि पर्यावरण की सुरक्षा महत्वपूर्ण है।
2 राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में” पर्यावरण के बचाव” को केंद्र में रखकर ही राष्ट्रीय पाठ्यचर्या के विकास की बात कही गई है अर्थात यह संपूर्ण शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है।
3 राष्ट्रीय स्तर पर N.C.E. R.T द्वारा विकसित सब्जी पाठ्यचर्या में इस पर ध्यान देने पर विशेष बल दिया गया है।
4 1975 की राष्ट्रीय पाठ्यचर्या(NCF 1975) प्राथमिक कक्षाओं में पर्यावरण को एक अलग विषय के रूप में पढ़ाने की थी। इसमें यह प्रस्तावित किया गया था कि पर्यावरण अध्ययन के रूप में प्राथमिक कक्षाओं में कक्षा 1 और कक्षा दो में प्राकृतिक और सामाजिक दोनों को सम्मिलित पाठ्यक्रम के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए एवं कक्षा 3 व 4 तक इसमें दो विषय के रूप में अर्थात पर्यावरणीय अध्ययन 1 ( प्राकृतिक विज्ञान) और पर्यावरण अध्ययन 2 ( सामाजिक विज्ञान) पढ़ाया जाना चाहिए ।
5 राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 तथा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 1988(NCF 1988) में भी पर्यावरण अध्ययन के बारे में उपयुक्त व्यवस्था को ही मंजूर किया गया था।
बोझ रहित अधिगम ( शिक्षा: राष्ट्रीय सलाहकार समिति की रिपोर्ट 1993)
ईश्वर भाई पटेल समीक्षा समिति 1977,NCERT कार्य समूह( 1984) और शिक्षा के लिए समीक्षा समिति पर राष्ट्रीय नीति(1990) ने सीखने के कार्य को आसान करने के लिए छात्रों पर शैक्षणिक बोझ को कम करने के लिए कई सिफारिशें की लेकिन कम होने के बजाय समस्या और अधिक तीव्र हो गई ,और इसीलिए संसाधन विकास मंत्रालय ने छात्रों पर शैक्षणिक बोझ बढ़ाने की समस्या की जांच करने के लिए 1992 में एक राष्ट्रीय सलाहकार समिति की स्थापना की( भारत सरकार 1993)
इसके उद्देश्यों में शामिल है-” जीवन भर स्वयं सीखने और कौशल तैयार करने के लिए क्षमता सहित की गुणवत्ता में सुधार करते हुए सभी स्तरों पर छात्रोंप् पर भार को कम करने के लिए तरीके और साधन सूझाना”
इस समिति ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की( 1993) “ बोझ रहित शिक्षण” – पर्यावरण शिक्षा पाठ्यक्रम पर निर्णय को काफी हद तक इसके द्वारा निर्देशित किया गया था।
NCF -2000 (राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2000)
NCF -2000 ने पहली बार सुझाव दिया की विभिन्न विषयों के विचारों और अवधारणाओं को एकीकृत किया जाए । जैसे- भारत की संस्कृति विरासत पर्यावरण की सुरक्षा, परिवार प्रणाली, कानूनी साक्षरता, मानव अधिकार शिक्षा, वैज्ञानिक सोच का पोषण इत्यादि।
NCF -2000 मैं पहली बार पर्यावरण अध्ययन को सामाजिक अध्ययन और विज्ञान के रूप में प्रथक प्रथक ना कर एकीकृत रूप में पढ़ने की सिफारिश की गई थी इसके अनुसार-
- कक्षा 1 व 2 ने इसे पाठ्यक्रम के अलग से विषय के रूप में नहीं रख कर इसे भाषा और गणित विषयों के साथ एकीकृत कर पढ़ाने के लिए कहा गया गणित की सामग्री बच्चे के नजदीक पर्यावरण के चारों ओर बनाई जानी है।
- कक्षा 3 व 4 में बच्चों को पर्यावरण एवं उसके प्राकृतिक और सामाजिक रूप में विभक्त ना करते हुए एक संपूर्ण विषय के रूप में पढ़ने के लिए कहा गया।
NCF -2005 (राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005)
- NCF -2005 मैं भी प्राथमिक कक्षाओं में पर्यावरण अध्ययन को एक रत रूप में ही सशक्त रूप से पढ़ने पर बल दिया गया।
- कक्षा 1 व कक्षा 2 में पर्यावरण संबंधी कौशल एवं सरोकारों को भाषा एवं गणित के माध्यम से संबोधित करने की संस्तुति दी गई।
- कक्षा 3 बा 4 तक अलग विषय के रूप में पढ़ाए जाने की संस्तुति दी गई।
पर्यावरण अध्ययन को एकीकृत करने की आवश्यकता-
ऐसा माना जाता है, कि बच्चा टुकड़े टुकड़े में खंडित बातों की बजाय संपूर्णता मैं बातों को आसानी से समझता है। जैसे कि बच्चा पेड़ को एक संपूर्ण पेड़ के रूप में पहचानता है। वह पेड़ को घर का पेड़ या बाहर का पेड़ के रूप में पहचानता है। वह मूर्त बातों को ही देखता हैऐसे में हम यदि उसे अमूर्त और अनुभव से परे की बात बताने लगे तो वह उन्हें अपने अनुभवों से जोड़ नहीं पाएगा और सूचनाओं को रटने लगेगा अपनी पर्यावरण के प्रति सार्थक समझ विकसित नहीं कर पाएगा।
NCERT द्वारा कक्षा 3- 5: तक पर्यावरण अध्ययन के पाठ्यक्रम को एकीकृत, स्वरूप प्रदान करने के लिए 6 विषय क्षेत्रों की पहचान की जिसमें बहु विशेयकता को एकीकृत किया गया इन्हें ”थीम” अर्थात प्रकरण कहां गया।
- परिवार एवं मित्र( संबंध, जानवर, पौधे, कार्य एवं खेल)
- भोजन
- आश्रय\ आवाज
- पानी
- यात्र
- चीजें जो हम बनाते और करते हैं
1 “परिवार एवं मित्र” प्रकरण की भाग के रूप में
- “पौधे” एवं” जानवर” : “पौधे” एवं” जानवर परिवार एवं मित्र प्रकरण में सोच समझकर शामिल किए गए हैं । यह स्पष्ट करने के लिए कि मानव पौधे और जीव जंतुओं के साथ प्रगाढ़ संबंध रखते हैं तथा हमें उनके बारे में पूर्ण एवं संगठित वैज्ञानिक एवं सामाजिक नजरिए से पढ़ने की आवश्यकता है।
- “रिश्ते\ संबंध” : इस उपप्रकरण में, वे अपने रिश्तेदारों के बारे में चर्चा करते हैं जो उनके साथ रहते हैं और जो कहीं और चले गए हैं जिससे उनके रिश्ते और घरों में क्या बदलाव आए हैं। उसका ज्ञान मिलता है वह सोचते हैं कि अपने रिश्तेदारों में कौन-कौन प्रशंसा के पात्र हैं एवं किन किन गुणों या कौशलों के कारण संबंध तथा परिवारों से बच्चों में अपनेपन तथा प्रेम की भावना का विकास होता है।
- “ काम तथा खेल” : इस उपप्रकरण से उन्हें यह पता चलता है, कि परिवार या पड़ोस में कुछ लोग काम करते हैं या कुछ काम नहीं करते हैं। इससे उन्हें लिंग भेज दो पर आधारित भूमिकाओं को भावात्मक रूप से समझने में सहायता प्राप्त होती है।
- वे जो खेल खेलते हैं उनका विश्लेषण करने का अवसर मिलता है किस प्रकार पारंपरिक खेल तथा खिलौने से वह अलग है यह समझ मिलती है।
पर्यावरण अध्ययन(EVS) (Environmental studies)
पर्यावरण अध्ययन परिवेश के सामाजिक और भौतिक घटकों की अंतर क्रियाओं का अध्ययन है। अतः जब हम अपने परिवेश, अर्थात इर्द-गिर्द उपस्थित उपरोक्त सामाजिक और बौद्धिक घटकों को समझने का प्रयास करते हैं, तो वहीं पर्यावरण अध्ययन कहलाता है।
सामाजिक घटक- भाषा, मूल्य, संस्कृति
भौतिक घटक- वनस्पति, पशु पक्षी, हवा, पानी
पर्यावरण शिक्षा(environmental education)
पर्यावरण शिक्षा में लोगों को बताया जाता है कि प्राकृतिक पर्यावरण के तरीके पर प्रदूषण मुक्त पर्यावरण को बनाए रखने के लिए परिस्थितिकी तंत्र को कैसे व्यवस्थित रखना चाहिए?
अर्थात पर्यावरण के विविध पक्षों इसके घटकों एवं मानव के साथ अंतः संबंध है । परिस्थितिक तंत्र, प्रदूषण विकास, नगरीकरण, जनसंख्या आदि का पर्यावरण पर प्रभाव आदि की समुचित जानकारी देना। .
उद्देश्य-
शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ज्ञान प्रदान कराने के साथ साथ जागरूकता पैदा करना, चिंतन का एक दृष्टिकोण पैदा करना और पर्यावरणीय चुनौतियों को नियंत्रित करने के आवश्यक कौशल को प्रदान करना है।
आज के बच्चे आंतरिक खेलों और इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों को खेलने में व्यस्त रहते हैं। जिससे उन्हें अपनी प्राकृतिक दुनिया के बारे में जानने के अवसर नहीं मिलते छात्रों को अपने परिवेश से परिचित कराने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, और इसलिए पर्यावरण शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल करना आवश्यक है।
पर्यावरण अध्ययन के उद्देश्य(NCF 2005) Objectives of environmental studies)
- बच्चों का उनके वास्तविक संसार( प्राकृतिक एवं सामाजिक- सांस्कृतिक) से परिचित करवाना, पर्यावरण का ज्ञान एवं समझ विकसित करना।
- प्रकृति में पारस्परिक निर्भरता तथा संबंधों का ज्ञान कराना तथा समाज का विकास कराना।
- पर्यावरण से संबंधित विषयों को समझने में उनकी सहायता कराना।
- पर्यावरण के अनुकूल मनोवृति ओ तथा मूल्यों को प्रोत्साहित एवं पोषितकरना।
- अवलोकन, रचनात्मक कौशल तथा सकारात्मक क्रियाओं को बढ़ावा देना।
- पिछले और वर्तमान पर्यावरण के मध्य तुलना विद्यार्थी कर सकें कि अतीत से अब में पर्यावरण में क्या परिवर्तन आया है।
- पर्यावरण मुद्दों के प्रति विद्यार्थियों को जागरूक होना।
- पर्यावरण के संरक्षण और प्रबंधन के लिए प्रभावी कार्रवाई का महत्व बताना।
- प्रश्न उठाने की क्षमता एवं उनका स्तर देने के लिए परिकल्पना(Hypothese) बनाने की क्षमता का विकास कराना।
- परिकल्पना ओं की जांच के तरीके सोच पानी एवं उन तरीकों को काम में लेने के लिए आवश्यक क्षमताओं का विकास करना।
- निष्कर्ष निकालने एवं चिंतन की क्षमता का विकास करना।
- बच्चों को करके सीखने का अवसर मिले, खोज करने के लिए पर्याप्त स्थान मिले।
- भौतिक और सामाजिक परिवेश के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना।
अधिगम(Learning)
अधिगम\ सीखना एक व्यापक सतत एवं जीवन पर्यंत चलने वाली महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। मनुष्य जन्म के उपरांत ही सीखना प्रारंभ कर देता है और जीवन भर कुछ न कुछ सीखता रहता है। इसे ही अधिगम कहते हैं।
अधिगम के सिद्धांत (Learning principles)
अधिगम के भी कुछ नियम है अधिगम की प्रक्रिया इन्हीं नियमों के अनुसार चलती है कुछ लेखकों ने इन नियमों को “ सिद्धांतों” ( principles)की संज्ञा दी है।
अधिगम क्रिया को बालक आभास या अनुभूति के फल स्वरुप संपन्न कर पाता है।
1 थार्नडाइक का सीखने का सिद्धांत(Thorndike’s theory of learning)
इस सिद्धांत को विभिन्न नामों से पुकारा जाता है जो कि इस प्रकार है।
1 थार्नडाइक का संबंध वाद का सिद्धांत(Connectionist theory)
2 उद्दीपन- प्रतिक्रिया सिद्धांत(Stimulus-reaction(R-S) theory)
3 सीखने का संबंध सिद्धांत(Bond theory of learning)
4 प्रयत्न एवं भूल का सिद्धांत (Trial & Error learning )
इस सिद्धांत के अनुसार- जब व्यक्ति कोई कार्य सीखता है। तब उसके सामने एक विशेष स्थिति या उद्दीपक होता है, जो एक विशेष प्रकार की प्रतिक्रिया करने के लिए प्रेरित करता है। इस प्रकार एक विशिष्ट उद्दीपक का एक वशिष्ठ प्रतिक्रिया से संबंध स्थापित हो जाता है। जिससे”उद्दीपक प्रतिक्रिया संबंध”(S-R Bond)द्वारा व्यक्त किया जा सकता है।
थार्नडाइक ने अपने सीखने के सिद्धांत का परीक्षण बिल्ली पर किया थार्नडाइक ने संबंध बाद के सिद्धांत में सीखने के क्षेत्र में प्रयास तथा त्रुटि को विशेष महत्व दिया है उन्होंने कहा है, कि जब हम किसी काम को करने में तृतीय भूल करते हैं,और बार-बार प्रयास करके त्रुटियों की संख्या कम या समाप्त की जाती है, तो यह स्थिति प्रयास एवं त्रुटि द्वारा सीखना कहलाती है।
इस सिद्धांत का शैक्षणिक महत्व
- शिक्षक इस सिद्धांत से समझते हैं कि बालक विभिन्न कौशलों को सीखने की प्रक्रिया में गलतियां कर सकते हैं।
- इसके आधार पर बार-बार के अभ्यास से बालक की गलतियों को कम किया जा सकता है।
- इस सिद्धांत के अनुसार बालक को सीखने के लिए अभी प्रेरित करने पर जोर दिया जाता है।
- यह सिद्धांत” करके सीखने” पर बल देता है।
1 थार्नडाइक का अधिगम के नियम(Tharndike’s Lows of learning)
इन नियमों को 2 वर्गों में विभाजित किया जा सकता है।
1 मुख्य नियम(Primary Lows)
- तत्परता का नियम( law of Readiness)
- अभ्यास का नियम(law of Exercise )
- प्रभाव का नियम(law of effect )
2 गौण नियम (Secondary laws)
- बहु अनु क्रिया का नियम (law of multiple response)
- मानसिक स्थिति का नियम(law of mental set)
- आंशिक क्रिया का नियम (law of partial activity)
- सादृश्य अनुक्रिया का नियम( law of similarity of Analogy)
थार्नडाइक ने सीखने के लिए पुनर्बलन को आवश्यक माना क्योंकि सीखी गई अनुप्रिया को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने के लिए पुनर्बलन आवश्यक होता है।
2 अनुकूलित अनुक्रिया का सिद्धांत(Classical conditioning theory)
इस सिद्धांत के प्रतिपादक रुचि शरीर शास्त्री “I.P पावलव” थे इन्होंने कुत्ते पर अपना प्रयोग किया था।
- इस सिद्धांत को संबंध प्रत्यावर्तन का सिद्धांत भी कहा जाता है, एवं इसे शास्त्रीय अनुबंधन का सिद्धांत भी कहा जाता है।
- इसके अनुसार- सीखना\ अधिगम एक अनुकूलित अनुक्रिया है।
- यह माना जाता है, कि उद्दीपक के प्रति अनुक्रिया करना(S-R)मानव की प्रवृत्ति है जब मूल उद्दीपक के साथ एक नवीन उद्दीपक प्रस्तुत किया जाता है, तथा कुछ समय पश्चात जब मूल उद्दीपक को हटा दिया जाता है। तब नवीन उद्दीपक के साथ अनुकूलित होजाती है जो मूल उद्दीपक से होती है। इस प्रकार अनुक्रिया उद्दीपक के साथ अनुकूलित हो जाती है।
इस सिद्धांत का शिक्षा में महत्व
- बालक ओं के समक्ष उचित एवं आदर्श व्यवहार प्रस्तुत करके उन्हें अनुकूलित अनुक्रिया द्वारा उन्हें उचित अभिवृत्ति का विकास किया जा सकता है।
- इस सिद्धांत के आधार पर उचित स्वभाव व आदत को आसानी से उत्पन्न किया जा सकता
- अनुकूलन तथा अभ्यास द्वारा बालक को में संवेगात्मक स्थिरता विकसित की जा सकती है। मानसिक उपचार में भी इस विधि का प्रयोग किया जाता है।
- इस सिद्धांत द्वारा बाला को में सामाजिकरण की प्रक्रिया तथा अनुकूलन कराकर बालको का सामाजिकरण किया जा सकता है।
3 स्किनर का सिद्धांत
इस सिद्धांत को निम्न नामों से भी जाना जाता है।
- कार्यात्मक और प्रतिबद्धता का सिद्धांत
- सक्रिय अनुबंधन का सिद्धांत
- क्रिया प्रसूत का अनुबंध सिद्धांत
स्किनर ने अपने प्रयोग चूहे एवं कबूतर की क्रियाओं पर किए हैं।
इस सिद्धांत के अनुसार- हम वह व्यवहार करना सीख जाते हैं । जिसमें परिणाम सकारात्मक होते हैं, और हम वह व्यवहार करना छोड़ देते हैं, जो हमें नकारात्मक परिणाम देते हैं इस प्रकार के व्यवहार को क्रिया प्रसूत अनुबंधन का सिद्धांत कहते हैं ।
इस सिद्धांत का शिक्षा में महत्व
- इस सिद्धांत में पुनर्बलन का अत्यधिक महत्व है पुनर्बलन के अनेक रूप हो सकते हैं, जैसे दंड, पुरस्कार, परिणाम का ज्ञान आदि।
- इस सिद्धांत के आधार पर पाठ्य वस्तु को छोटे-छोटे भागों में बांटने पर बल दिया जाता है ,जैसे अधिगम शीघ्र तथा प्रभाव कारी हो जाता है।
- छात्रों के व्यवहार को वांछित स्वरूप तथा दिशा प्रदान करने में यह सिद्धांत शिक्षकों की सहायता करता है। यह सिद्धांत बताता है कि यदि अपने छात्रों को उनके प्रयासों के परिणाम का ज्ञान करा दिया जाए तो विद्यार्थी अपने कार्य में अधिक उन्नति कर सकते हैं।
4 प्रबलन सिद्धांत (Reinforcement Theory)
प्रतिपादक – सी .एल .हल (अमेरिका)
Book – principles of behaviour
यह सिद्धांत थार्नडाइक तथा पावलव के सिद्धांत पर आधारित था इस सिद्धांत के अनुसार- ” प्रत्येक मनुष्य अपनी आवश्यकता की पूर्ति करने का प्रयत्न करता है सीखने का आधार की आवश्यकता की पूर्ति की प्रक्रिया है मनुष्य या पशु उसी कार्य को सीखता है जिस कार्य से उसकी इसी आवश्यकता की पूर्ति होती है”
हल का कथन- “सीखना आवश्यकता की पूर्तिकी प्रक्रिया द्वारा होता है”
- यह सिद्धांत बालक ओं के शिक्षण में प्रेरणा पर अत्याधिक बल देता है बालक को को प्रेरित करके ही पढ़ाया जा सकता है।
- स्किनर इस सिद्धांत को सीखने का सर्वश्रेष्ठ सिद्धांत मानते हैं।
- वास्तव में सीखने का सिद्धांत” चालक न्यूनता का सिद्धांत” (Drive Reduction Theory)है।
- हल्के अनुसार, जब किसी जीवधारी की कोई आवश्यकता पूरी नहीं होती तब उसमें असंतुलन उत्पन्न हो जाता है।
Ex. 1 बिल्ली – क्रियाशील – भोजन प्राप्त
(भूखी) भूख( चालक)
2 बिल्ली की भूख की आवश्यकता संतुष्ट हो जाती है। परिणाम स्वरूप भूख से चालक शक्ति बंद हो जाती है।
शैक्षणिक महत्व-
1 यह सिद्धांत इस बात पर बल देता है कि विद्यालय की विभिन्न क्रियाओं में बालकों की आवश्यकताओं पर भी ध्यान दिया जाए।
2 यह सिद्धांत शिक्षा में प्रेरणा को महत्व देता है।
3 यह सिद्धांत कहता है कि कक्षा में पढ़ाई जाने वाले तथ्यों के उद्देश्य को स्पष्ट करना परम आवश्यक है।
4 इस सिद्धांत की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें बालकों की क्रियाओं और आवश्यकताओं से संबंधित की स्थापना पर विशेष बल दिया जाता है।
5 यह सिद्धांत बताता है कि पाठ्यक्रम का निर्माण बालकों की विभिन्न आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए।
5 सूझ अंतर्दृष्टि का सिद्धांत (Insight Theory)
इस सिद्धांत के प्रतिपादक– कोहलर
- अंतर्दृष्टि या सूझ के सिद्धांत के प्रमुख समर्थक ”गेस्टाल्टवादी” है।
- उनके मतानुसार व्यक्ति या प्राणी “संबंध प्रतिक्रिया तथा प्रयत्न और भूल से ना सीख कर सूझ(Insight) द्वारा सीखते हैं।”
- सर्वप्रथम प्राणी अपने आसपास की परिस्थिति के विभिन्न अंग में पारस्परिक संबंधों की स्थापना करता है ,और संपूर्ण परिस्थिति को समझने का प्रयास करता है तत्पश्चात उसके अनुसार अपनी प्रतिक्रिया करता है।
- अन्य शब्दों में सूझ द्वारा सीखने का तात्पर्य परिस्थिति को पूर्णतया समझकर सीखना है।
कोहलर का प्रयोग – सूझ द्वारा सीखने के सिद्धांत का प्रतिपादन करने के लिए कूलर ने 6 वनमानुष ओं की एक कमरे में बंद कर दिया कमरे की छत पर खेलों का एक गुच्छा लटका दिया और कमरे के कोने में एक बॉक्स रख दिया
वनमानुष के समान मनुष्य भी सूझ के आधार पर सीखते हैं प्रत्येक कार्य या क्रिया के सीखने में हमें सूझ का प्रयोग करना पड़ता है। विभिन्न समस्याओं का हल भी सूझ के माध्यम से होता है।
सूझ को प्रभावित करने वाले कारक – बुद्धि, समस्या की रचना, अनुभव।
शिक्षा में महत्व-
- अध्यापक द्वारा कुछ समस्या छात्रों की समक्ष समग्र रूप से प्रस्तुत की जानी चाहिए किसी भी समस्या में उस समय तक सूझ उत्पन्न नहीं होगी जब तक कि वह समग्र रूप मैं छात्र के समक्ष प्रस्तुत ना हो जाए।
- बालकों का ध्यान समस्या में केंद्रित करने के लिए आवश्यक है कि अध्यापक द्वारा सीखने में बालकों की जिज्ञासा को बताएं रखा जाए बिना जिज्ञासा केसूझ का विकास संभव नहीं है।
- सूझ द्वारा सीखने में अनुभव का अधिक योगदान रहता है अध्यापक और छात्र के पूर्व अनुभव के संगठन द्वारा ध्यान देना चाहिए।
- सूझ के विकास के लिए आवश्यक है ,कि विद्यालय का कार्य छात्र को सूझ के अनुकूल होना चाहिए
- अंतर्दृष्टि का विकास तभी संभव है । जबकि उद्देश्य छात्रों को स्पष्ट होंगे तथा छात्रों के लिए उपयोगी होंगे उद्देश्यों का दृष्टिकोण करके अध्यापक बालकों को प्रेरित कर सकता है।
राष्ट्रीय वन अधिनियम, 1927 और इसका महत्व
राष्ट्रीय वन अधिनियम, 1927 अपने प्रकार का पहला व्यापक कानून है, जो विशेष रूप से वन क्षेत्र से संबंधित सभी हितधारकों, खासकर स्थानीय लोगों, को जोड़ने की बात करता है, ताकि वन संरक्षण की परिकल्पना को साकार किया जा सके। इस लेख में हम नीचे राष्ट्रीय वन अधिनियम, 1927, इसके उद्देश्यों, प्रमुख विशेषताओं और इसके महत्व के बारे में विस्तार से जानेंगे।
राष्ट्रीय वन अधिनियम, 1927 का अवलोकन
राष्ट्रीय वन अधिनियम, 1927 को वन संसाधनों की आवाजाही और उनसे संबंधित शुल्कों को विनियमित करने के लिए लागू किया गया था। इसमें क्षेत्रों को आरक्षित वन, संरक्षित वन या ग्राम वन के रूप में घोषित करने की प्रक्रिया भी बताई गई है।
यह कानून वन से संबंधित विभिन्न अपराधों को परिभाषित करता है, आरक्षित वनों में प्रतिबंधित गतिविधियों को निर्धारित करता है और उल्लंघनों के लिए दंड का प्रावधान करता है।
राष्ट्रीय वन अधिनियम, 1926 क्या है?
राष्ट्रीय वन अधिनियम, 1927, इससे पहले बनाए गए वन अधिनियमों का उत्तराधिकारी है। यह अधिनियम पारंपरिक रूप से वन क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के कानूनी अधिकारों को उजागर करता है और उन्हें मान्यता प्रदान करता है। यह औपनिवेशिक वन अधिनियमों से हुए नुकसान को सुधारने की दिशा में एक कदम था। इस प्रकार, यह वन्यजीव संरक्षण के लिए स्थानीय समुदायों और जनता को अपनी बात रखने का अवसर प्रदान करता है।
राष्ट्रीय वन अधिनियम, 1927 की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अधिनियम को इसके प्रारंभिक रूप से 1865 में लागू किए जाने के बाद दो बार संशोधित किया गया—पहली बार 1878 में और फिर 1927 में। राष्ट्रीय वन अधिनियम, 1927 से पहले के अधिनियमों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है।
| वर्ष | मुख्य उद्देश्य |
|---|---|
| भारतीय वन अधिनियम, 1865 | 1864 में स्थापित इम्पीरियल फॉरेस्ट डिपार्टमेंट का उद्देश्य विभिन्न कानूनी उपायों के माध्यम से वनों पर ब्रिटिश अधिकार स्थापित करना था। |
| भारतीय वन अधिनियम, 1878 | 1878 के वन अधिनियम ने बंजर भूमि पर संप्रभुता का दावा करके ब्रिटिश प्रभुत्व का विस्तार किया और स्थानीय लोगों को पहले दिए गए कुछ अधिकारों को सरकार द्वारा वापस लेने की अनुमति दी। |
| भारतीय वन अधिनियम, 1927 | इस अधिनियम का वनों पर निर्भर समुदायों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। इसमें दिए गए दंड और प्रक्रियाओं का उद्देश्य वनों पर राज्य के अधिकार को मजबूत करना था। |
राष्ट्रीय वन अधिनियम, 1927 के उद्देश्य
राष्ट्रीय वन अधिनियम, 1927 को लागू करने के पीछे कई उद्देश्य थे, जो व्यापक वन प्रबंधन की तत्काल आवश्यकता को दर्शाते थे:
- पहले से मौजूद वन संबंधी कानूनों को एकीकृत करना।
- सरकार को विभिन्न प्रकार के वनों को निर्धारित करने का अधिकार देना, ताकि उनका प्रभावी उपयोग किया जा सके।
- वन उत्पादों की आवाजाही और परिवहन को नियंत्रित करना तथा लकड़ी और अन्य वन संसाधनों पर शुल्क लगाना।
- किसी क्षेत्र को आरक्षित वन, संरक्षित वन या ग्राम वन के रूप में वर्गीकृत करने की प्रक्रिया निर्धारित करना।
- वन संबंधी अपराधों को परिभाषित करना, आरक्षित वनों में प्रतिबंधित कार्यों की सूची बनाना और उल्लंघनों के लिए दंड निर्धारित करना।
- वन और वन्यजीव संरक्षण के प्रति जवाबदेही को बढ़ाना।
राष्ट्रीय वन अधिनियम, 1927 के अंतर्गत प्रदान किए गए अधिकारों के प्रकार
राष्ट्रीय वन अधिनियम, 1927 के अंतर्गत तीन प्रकार के अधिकार प्रदान किए गए हैं:
- भूमि अधिकार: उन स्थानीय लोगों को भूमि अधिकार प्रदान किए जाते हैं, जो 13 दिसंबर 2005 से पहले से भूमि पर खेती कर रहे हैं।
- उपयोग के अधिकार: कानून के अंतर्गत लघु वन उपज, जैसे जड़ी-बूटियाँ, तेंदू पत्ता, औषधीय पौधे आदि के उपयोग और/या संग्रह करने का अधिकार प्रदान किया गया है।
- संरक्षण एवं सुरक्षा का अधिकार: कानून ग्राम समुदायों के लोगों की भागीदारी से वनों की रक्षा और उनके प्रबंधन का अधिकार प्रदान करता है।
राष्ट्रीय वन अधिनियम, 1927 के अंतर्गत आने वाले वन के प्रकार
यह अधिनियम निम्नलिखित प्रकार के वनों को शामिल करता है:
- आरक्षित वन: ये सबसे अधिक प्रतिबंधित वन होते हैं। इन्हें राज्य सरकार द्वारा ऐसी भूमि पर घोषित किया जाता है जो या तो वन क्षेत्र हो या सरकार के स्वामित्व वाली बंजर भूमि हो। सामान्यतः स्थानीय निवासियों को इनमें प्रवेश की अनुमति नहीं होती, जब तक कि बंदोबस्त प्रक्रिया के दौरान वन अधिकारी द्वारा अनुमति न दी जाए।
- संरक्षित वन: राज्य सरकार आरक्षित वनों के अलावा अन्य भूमि पर संरक्षित वन स्थापित कर सकती है। यहाँ सरकार के पास स्वामित्व संबंधी अधिकार होते हैं और वह वन के उपयोग को नियंत्रित करने वाले नियम बना सकती है। इस अधिकार का प्रयोग मुख्यतः उन पेड़ों पर राज्य का नियंत्रण स्थापित करने के लिए किया जाता है जिनसे राजस्व प्राप्त होने की संभावना होती है।
- ग्राम वन: ये ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ राज्य सरकार किसी गाँव के समुदाय को ऐसी भूमि पर अधिकार प्रदान कर सकती है, जिसे प्रारंभ में आरक्षित वन के रूप में घोषित किया गया था।
राष्ट्रीय वन अधिनियम, 1927 का महत्व
राष्ट्रीय वन अधिनियम, 1927 कई व्यापक उद्देश्यों से प्रेरित था, जिनमें से प्रत्येक सतत वन प्रबंधन के व्यापक लक्ष्य में योगदान देता है:
- पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता: सतत उपज के सिद्धांत को बढ़ावा देकर यह अधिनियम वनों के अत्यधिक दोहन को रोकने में सहायक रहा। इसके दिशानिर्देशों के अंतर्गत प्रबंधित वनों ने विभिन्न प्रकार के वनस्पतियों और जीव-जंतुओं के लिए महत्वपूर्ण आवास प्रदान किए तथा भविष्य की पीढ़ियों के लिए जैव विविधता के संरक्षण में योगदान दिया।
- वनों का संरक्षण: इस अधिनियम का उद्देश्य वनों को उनके पारिस्थितिक और आर्थिक महत्व के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत करके उनका संरक्षण करना है। यह वर्गीकरण संरक्षण संबंधी उपायों को लागू करने में सहायता करता है।
- अधिकारों की स्थापना: इस अधिनियम ने स्थानीय समुदायों और वन क्षेत्रों में रहने वाली जनजातियों के अधिकारों को मान्यता दी, लेकिन सतत प्रबंधन के लिए सरकार को उनके वन संसाधनों तक पहुँच को नियंत्रित और सीमित करने की अनुमति भी दी।
- वन अपराध और दंड: यह अधिनियम बिना अनुमति पेड़ काटने, शिकार करने या वन संरक्षण को नुकसान पहुँचाने वाली अन्य गतिविधियों में शामिल होने वालों को दंडित करता है। इससे अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण और वन संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग को बढ़ावा मिला।
- वन अधिकारी और प्रशासन: इस अधिनियम ने वन अधिकारियों की भूमिकाओं और शक्तियों को निर्धारित किया। ये अधिकारी अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने और वन संसाधनों का प्रभावी प्रबंधन करने के लिए जिम्मेदार होते हैं।
- वन आरक्षित क्षेत्र और संरक्षित क्षेत्र: इस अधिनियम के अंतर्गत कुछ वन क्षेत्रों को आरक्षित और संरक्षित वन घोषित करने की व्यवस्था की गई, जिससे उनका संरक्षण सुनिश्चित हो सके और उन्हें अनधिकृत दोहन से बचाया जा सके।
- ग्राम वन: इस अधिनियम ने ग्राम वन की अवधारणा को मान्यता दी, जिससे स्थानीय समुदायों को अपने गाँवों के आसपास के वनों के प्रबंधन और उपयोग में भाग लेने का अवसर मिला।
राष्ट्रीय वन अधिनियम, 1927 की कमियाँ
महत्वपूर्ण होने के बावजूद इस अधिनियम में कुछ कमियाँ भी थीं:
- भारत की वनस्पति की सुरक्षा का दावा करने के बावजूद, यह अधिनियम मुख्य रूप से पेड़ों की कटाई और वन उत्पादों के दोहन से राजस्व प्राप्त करने की आवश्यकता से प्रेरित था।
- इस अधिनियम ने वन प्रशासन को व्यापक विवेकाधिकार और शक्तियाँ प्रदान कीं, जिसके कारण कई बार वन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के साथ दुर्व्यवहार हुआ।
- इसके कारण खानाबदोश और जनजातीय समूहों के वनों तथा उनके संसाधनों तक पहुँच से संबंधित पैतृक अधिकारों और विशेषाधिकारों में कमी आई।
- जैव विविधता और मृदा अपरदन की रोकथाम जैसे अन्य मूल्यों की तुलना में लकड़ी से प्राप्त होने वाले राजस्व को अधिक प्राथमिकता दी गई।
राष्ट्रीय वन अधिनियम, 1927 के बाद की पहल
इस अधिनियम की कमियों को दूर करने के लिए बाद में निम्नलिखित उपाय किए गए:
- भारतीय वन नीति, 1952: यह औपनिवेशिक नीति का विस्तार थी। इसमें कुल भूमि क्षेत्र के एक-तिहाई हिस्से तक वन क्षेत्र बढ़ाने की आवश्यकता को स्वीकार किया गया, साथ ही विभिन्न राष्ट्रीय हितों के लिए राजस्व प्राप्ति पर भी जोर दिया गया।
- वन संरक्षण अधिनियम, 1980: वन क्षेत्रों में सतत कृषि-वनीकरण के लिए केंद्र सरकार की अनुमति की व्यवस्था शुरू की गई तथा बिना अनुमति किए गए उल्लंघनों को दंडनीय बनाया गया।
- राष्ट्रीय वन नीति, 1988: इसमें व्यावसायिक हितों की तुलना में पारिस्थितिक संतुलन और सहभागी वन प्रबंधन को प्राथमिकता दी गई।
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